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मंगलवार, 7 अप्रैल 2020
 
 

नागरिकता संशोधन कानून: हिंसक प्रदर्शनों पर विदेशी मीडिया ने क्या कहा?

रविवार, 22 दिसम्बर, 2019  आई बी टी एन खबर ब्यूरो
 
 
नागरिकता क़ानून में संशोधन को संसद की मंज़ूरी मिलने के बाद से ही पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

पिछले दो-तीन दिन में अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस सिलसिले में काफी कुछ लिखा है।

अमरीकी अख़बार 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने लिखा है कि भारत में हो रहे प्रदर्शनों के ज़रिये भारतीय मुसलमान मोदी सरकार को पीछे धकेलने का प्रयास कर रहे हैं।

अख़बार ने लिखा, "सत्तारूढ़ दल बीजेपी की मुस्लिम समुदाय को प्रभावित करने वाली अन्य नीतियों की तुलना में नागरिकता क़ानून को अधिक प्रभाव छोड़ने वाले नियम के तौर पर देखा जा रहा है।''

भारत की राजधानी दिल्ली में छात्रों की पिटाई और दूरसंचार सेवाओं को बाधित किये जाने के सरकार-पुलिस के फ़ैसले पर भी 'द वॉल स्ट्रीट जर्नल' ने रिपोर्ट लिखी है।

दैनिक अमरीकी अख़बार 'द वॉशिंगटन पोस्ट' ने लिखा है कि भारत के देशव्यापी प्रदर्शन प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक चुनौती हैं।

अख़बार लिखता है, "मई 2019 में दूसरी बार बड़ी जीत हासिल करने के बाद मोदी ने अपनी पार्टी के एजेंडे को लागू करने की कोशिशें तेज कर दी हैं और वो हिंदुत्व को प्राथमिकता देते हुए फ़ैसले ले रहे हैं।''

'द वॉशिंगटन पोस्ट' के एडिटोरियल बोर्ड ने भारत के मौजूदा हालात पर एक अन्य लेख भी लिखा है जिसका शीर्षक है, "भारतीय लोकतंत्र ने एक नए निम्न स्तर को छुआ''।

इस लेख में अख़बार ने सीएए के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शनों के बीच कश्मीर घाटी में अब तक के सबसे लंबे इंटरनेट शट-डाउन को केंद्र में रखा है।

'द वॉशिंगटन पोस्ट' ने मोदी सरकार द्वारा बनाए गए नए नागरिकता क़ानून पर अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की चुप्पी की वजहों को टटोलने की कोशिश की है।

अख़बार ने लिखा है कि अमरीका के पास मोदी की नीतियों पर ना बोलने या मोदी पर किसी तरह का दबाव ना डालने की स्पष्ट वजहें रही होंगी क्योंकि वो एक बैलेंस बनाना चाहेंगे ताकि भारत, अमरीका के व्यापारिक और रक्षा हितों का ध्यान रखे। यही वजह है कि अमरीकी सरकार ने भारत के नए विवादित क़ानून पर कोई कड़ा रुख नहीं अपनाया।

'द न्यू यॉर्क टाइम्स' ने एक लेख प्रकाशित किया है 'भारत उठ खड़ा हुआ है ताकि अपनी आत्मा को जीवित रख सके'।

वेबसाइट ने अपने इस लेख में लिखा है कि मोदी सरकार की सत्तावादी और विभाजनकारी नीतियों ने भारतीयों को देश की सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। भारत के मुसलमान जो क़रीब छह वर्ष तक चुप्पी साधे रहे, जिसे डर कहना भी ग़लत नहीं होगा, वो संगठित होकर अब सड़कों पर हैं क्योंकि वो अपनी नागरिकता और वजूद को लेकर चिंतित हैं।

एक अन्य लेख को 'द न्यू यॉर्क टाइम्स' ने शीर्षक दिया है, 'मोदी देश में हिंदू एजेंडा थोपने की कोशिश कर रहे हैं, तो धर्मनिरपेक्ष भारत उसका करारा जवाब देने को उठ खड़ा हुआ है।''

इस लेख में प्रदर्शनकारियों के हवाले से लिखा गया है कि मोदी सरकार जिस तरह देश की बुनियाद रही यहाँ की विविधता पर हमला बोल रही है, लोग सरकार के उस रवैये के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए सड़कों पर हैं।

'द न्यू यॉर्क टाइम्स' के एडिटोरियल बोर्ड ने लिखा है कि भारत के नागरिकता अधिनियम में जिस तरह का संशोधन किया गया है, उसने पीएम मोदी के कट्टरपन का पर्दाफ़ाश कर दिया है।

इस लेख में लिखा है, "नागरिकता क़ानून भारत में ऐसी पहली कार्रवाई है जिसने धर्म को नागरिकता से जोड़ दिया है।''

अख़बार लिखता है कि दुनिया की अन्य सरकारों की तरह बिना दस्तावेज़ वाले शरणार्थियों को भारत सरकार ने भी एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप यह कर चुके हैं। लेकिन भारतीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसके ज़रिए अपने सबसे बड़े टारगेट यानी बांग्लादेशी मुसलमानों को निशाना बनाया है जिन्हें वो दीमक तक कह चुके हैं।

ब्रितानी दैनिक अख़बार 'द गार्जियन' ने भारत में चल रहे प्रदर्शनों पर प्रकाशित एक रिपोर्ट को शीर्षक दिया है, "भारत में दशकों बाद हो रहे इतने बड़े विरोध प्रदर्शनों से संकेत मिलते हैं कि मोदी वाक़ई काफ़ी आगे बढ़ गए।''

अख़बार ने लिखा है कि बीते चार दशकों में ये सबसे विशाल प्रदर्शन कहे जा सकते हैं जिनकी आवाज़ को दबाने के लिए मोदी सरकार ने लगभग पूरे भारत में निषेधाज्ञा लगा दी है। लेकिन हिंदू हों या मुसलमान, जवान या बुज़ुर्ग, किसान और छात्र, सभी इन प्रदर्शनों में शामिल हो रहे हैं।

इसके साथ ही अख़बार ने भारत के राजधानी क्षेत्र में इंटरनेट सेवाएं बाधित किये जाने की अपनी रिपोर्ट में आलोचना की है।

अमरीकी टीवी चैनल सीएनएन ने अपनी वेबसाइट पर शीर्षक लगाया है, 'घातक हिंसा के एक दिन बाद भारत ने प्रदर्शनों पर कसा शिकंजा'।

इस शीर्षक पर आधारित ख़बर में लिखा है कि भारत के कम से कम 15 शहरों में 10 हज़ार से अधिक लोग सड़कों पर उतरे हैं। इन शहरों में नई दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु और कोलकाता शामिल हैं। इन शहरों में लोगों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ बड़े विरोध प्रदर्शन किये।

सीएनएन ने इन ख़बरों के अलावा अपनी वेबसाइट पर एक फ़ोटो गैलरी भी प्रकाशित की है जिसमें विरोध प्रदर्शन के दौरान घटी अलग-अलग घटनाओं को दिखाया गया है।

एक तस्वीर में जहाँ पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों पर लाठी बरसा रहे हैं, वहीं दूसरी फ़ोटो में आग में घिरे थाने से पुलिसकर्मी बाहर भागते दिखाई दे रहे हैं।

सीएनएन ने अपनी फ़ोटो गैलरी में जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से लेकर पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रैली तक को जगह दी है।

क़तर का समाचार टीवी चैनल अल-जज़ीरा लगातार भारत में जारी विरोध प्रदर्शनों को कवर कर रहा है।

अल-जज़ीरा अपनी वेबसाइट पर इससे जुड़ी तस्वीरों को भी प्रमुखता से जगह दे रहा है।

शनिवार को अल-जज़ीरा ने अपनी वेबसाइट पर शीर्षक लगाया, 'नागरिकता क़ानून को लेकर प्रदर्शनों में 8 वर्षीय लड़के समेत कई लोग मारे गए'।

अल-जज़ीरा लिखता है कि मुस्लिम विरोधी समझे जा रहे क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों में मरने वालों की संख्या 21 पहुँची, उत्तरी भारत के प्रांत उत्तर प्रदेश में कम से कम 15 लोगों की मौत।

इन प्रदर्शनों के साथ-साथ अल-जज़ीरा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आलोचना करने की ख़बरों को भी अपने पन्ने पर जगह दी है।

मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद की नागरिकता क़ानून की आलोचना करने को भी अल-जज़ीरा ने अपने पन्ने पर जगह दी।

'द जापान टाइम्स' ने भी इन प्रदर्शनों से जुड़ी ख़बरें प्रकाशित की हैं।

वेबसाइट ने अपने यहाँ एक नज़रिया प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक दिया गया है कि 'भारत अपने संस्थापक सिद्धांतों को ही छोड़ रहा है'।

इस लेख में 'द जापान टाइम्स' ने लिखा है कि हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए राष्ट्र-निर्माण का कार्य तब तक अधूरा है जब तक कि देश में कई पहचान वाले लोग हैं जो सभी भारतीय होने का दावा कर सकते हैं।

वेबसाइट ने लिखा है कि 'हिंदू राष्ट्रवादी मानते हैं कि एकीकृत राष्ट्र के बिना देश की मज़बूती और आर्थिक विकास असंभव हैं'।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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