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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020
 
 

बैलिस्टिक मिसाइल: क्या उत्तर कोरिया की नई बैलिस्टिक मिसाइल से अमरीका को चिंतित होना चाहिए?

सोमवार, 12 अक्टूबर, 2020  आई बी टी एन खबर ब्यूरो
 
 
उत्तर कोरिया की नई बैलिस्टिक मिसाइल के विशाल आकार ने हथियारों के जाने-माने विशेषज्ञों को भी चकित कर दिया है।

उत्तर कोरिया की सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी की 75वीं वर्षगाँठ पर आयोजित कार्यक्रम में लोगों ने मध्यरात्रि में एक अनोखी सैनिक परेड देखी। धूमधाम से हुए इस कार्यक्रम में वो सभी चीज़ें थी, जिसकी दुनिया को उम्मीद थी।

इस कार्यक्रम में चेयरमैन किम जोंग उन का भाषण भी हुआ। इस भाषण में उत्तर कोरिया के संघर्ष का बखान करते हुए किम जोंग उन कई बार रो पड़े।

कार्यक्रम के आख़िर में उत्तर कोरिया ने अपनी सबसे बड़ी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) का प्रदर्शन किया।

एक जनवरी 2020 को किम जोंग उन ने सालाना नव वर्ष के भाषण में घोषणा की थी कि उत्तर कोरिया ऐसी आधुनिक हथियार प्रणाली विकसित कर रहा है, जो सिर्फ़ उन्नत देशों के पास है।

उन्होंने ख़ास तौर से सामरिक शब्द का इस्तेमाल किया, जिसका मतलब परमाणु हथियार प्रणाली से था।

किम जोंग उन ने इसे अमरीका से जोड़ते हुए कहा था कि भविष्य में अमरीका हमें रोकेगा और उत्तर कोरिया व अमरीका के रिश्ते को हल करने में हिचकिचाहट दिखाएगा, लेकिन वो उत्तर कोरिया की शक्ति के आगे असहाय साबित होगा। जबकि उत्तर कोरिया उम्मीद से अधिक मज़बूत हो रहा है।

उत्तर कोरिया की नई बैलिस्टिक मिसाइल वो सामरिक हथियार है, जिसका वादा किम जोंग उन ने किया था। इसका निशाना अमरीका है और अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ हुई विफल बातचीत के नतीजे के रूप में सामने आया है।

उत्तर कोरिया ने पहले ही दो बैलिस्टिक मिसाइल्स (आईसीबीएम) का परीक्षण किया है। वर्ष 2017 में ह्वासोंग-14 मिसाइल का दो बार परीक्षण हुआ था। ये मिसाइल 10 हज़ार किलोमीटर तक मार कर सकती है और इसकी पहुँच सभी यूरोपीय देशों और अमरीका के आधे हिस्से तक है। ये मिसाइल एक परमाणु हथियार भी ले जाने में सक्षम है।

2017 में ही उत्तर कोरिया ने ह्वासोंग-15 का भी परीक्षण किया था, जो 13 हज़ार किलोमीटर तक मार कर सकती है। इसका मतलब ये हुआ कि इसकी पहुँच अमरीका के किसी भी हिस्से तक है। ये भी एक परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है।

लेकिन उत्तर कोरिया ने जिस नई बैलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) को प्रदर्शित किया है, इसका परीक्षण नहीं किया गया है। ये मिसाइल दो स्तर वाला तरल ईंधन मिसाइल ही है, लेकिन इसका आकार ह्वासोंग-15 से बड़ा है।

जब तक इसका परीक्षण नहीं होता या इसका इंजन नहीं दिखाया जाता, ये बता पाना मुश्किल है कि इसकी मारक क्षमता कितनी दूरी तक की है।

हालाँकि इसकी डिज़ाइन से उत्तर कोरिया की मंशा स्पष्ट हो जाती है कि उन्हें अब अपनी मिसाइल की रेंज बढ़ाने की कोई ज़रूरत नहीं।

इसके उलट उत्तर कोरिया अब इस पर ध्यान दे रहा है कि एकमात्र परमाणु हथियार की जगह ये मिसाइल कैसे ज़्यादा परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हो।

ये अमरीकी मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम के लिए तगड़ा झटका है, क्योंकि हथियार लेकर आने वाली हर मिसाइल के लिए कई इंटरसेप्टर्स लॉन्च करने की आवश्यकता होती है।

उन्नत परमाणु हथियारों वाले देशों के पास कई इंडिपेन्डेंट री-एंट्री वीइकल या एमआईआरवी होते हैं और अब उत्तर कोरिया भी यही हासिल करने की कोशिश कर रहा है।

आईसीबीएम की डिज़ाइन को लेकर कई सवाल पहले से ही हैं। इस कारण अभी ये अनिश्चित है कि इसका परीक्षण कब होगा और इसे तैनात कब किया जाएगा। लेकिन वो ट्रक ज़रूर चिंता का विषय है, जिस पर लादकर मिसाइल को प्रदर्शित किया गया।

उत्तर कोरिया के परमाणु युद्ध में शामिल होने की क्षमता की एक बड़ी बाधा उनके पास मौजूद लॉन्चर्स की संख्या है। आख़िरकार, आप केवल उतने ही मिसाइल लॉन्च कर सकते हैं, जितने के लिए आपके पास लॉन्चर हैं।

अमरीका का ये आकलन है कि उत्तर कोरिया अधिक से अधिक 12 आईसीबीएम लॉन्च कर सकता है। ये गणना इस पर आधारित है कि उत्तर कोरिया के छह लॉन्चर्स (जिनकी जानकारी है) में से प्रत्येक एक आईसीबीएम लॉन्च करता है और उसके बाद अमरीका की जवाबी कार्रवाई से पहले ये लॉन्चर दूसरी मिसाइल को लॉन्च करने की कोशिश में तुरंत जुट जाते हैं।

वर्ष 2010 में उत्तर कोरिया ने अवैध रूप से चीन से छह WS51200 ट्रक आयात किए थे। बाद में इन अत्यधिक टिकाऊ ट्रकों को हाइड्रोलिक्स की मदद से ट्रांसपोर्टर इरेक्टर लॉन्चर्स में बदल दिया। इन्हीं की मदद से उत्तर कोरिया ने अपनी बैलिस्टिक मिसाइल्स का प्रदर्शन किया है।

ये ट्रक इतने क़ीमती हैं कि ये मिसाइल लॉन्च होने से पहले उन्हें दूर ले जाते हैं, क्योंकि अगर मिसाइल नाकाम होती है, तो उन्हें बदलना काफ़ी कठिन होता है।

ताज़ा परेड में पहली बार इन भारी भरकम छह ट्रकों को देखा गया। इन नए ट्रकों में काफ़ी बदलाव किए गए हैं।

इसलिए ये स्पष्ट है कि पाबंदियों और निर्यात में नियंत्रण के बावजूद उत्तर कोरिया इन लॉन्चर्स के उपकरणों को हासिल करने में सफल रहा है। ये भी स्पष्ट है कि उन्होंने अपना मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर भी बना लिया है, जिस कारण अपने देश में ही वे इसमें बदलाव कर पा रहे हैं। और अब संभव है कि वे अपना ख़ुद का मिसाइल लॉन्चर भी बना लें।

उत्तर कोरिया की नई मिसाइल ऐसे समय में बनी है, जब इस साल देश को कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा है। दुनिया को ये संदेश है कि उनके देश को, उनके नेता को और उनकी तकनीकी क्षमता को नज़रअंदाज़ न किया जाए।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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