• Name
  • Email
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020
 
 

क्या चीन और ईरान की नजदीकी से अमरीका को चिंतित होना चाहिए?

मंगलवार, 13 अक्टूबर, 2020  आई बी टी एन खबर ब्यूरो
 
 
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने मध्य पूर्व में जारी तनाव को खत्म करने के लिए एक नए फोरम को बनाए जाने की बात की है। ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ के साथ बैठक के बाद उन्होंने यह बयान दिया है।

साथ ही वांग यी ने ईरान को चीन के समर्थन की बात को एक बार फिर से दोहराया है।

10 अक्टूबर 2020 को चीन के टेंगचोंग शहर में वांग यी और जवाद ज़रीफ के बीच हुई बैठक में ईरान के साथ वैश्विक ताकतों के 2015 में हुए परमाणु समझौते पर अपनी प्रतिबद्धता को भी दोहराया गया है। इसमें अमरीका की ईरान के साथ परमाणु समझौते से पीछे हटने के लिए आलोचना की गई है।

पिछले कुछ वर्षों से चीन और ईरान के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं।

ईरान मध्य पूर्व की एक बड़ी ताकत सऊदी अरब के साथ यमन में छिड़ी लड़ाई, इराक में दबदबा बनाने की जंग और अमरीका के प्रतिबंधों को सऊदी समर्थन जैसे मसलों पर भिड़ा हुआ है।

ईरान के साथ चीन के रिश्ते ऐसे वक्त में मजबूत हो रहे हैं जबकि अमरीका के साथ चीन के रिश्ते लगातार नीचे की ओर जा रहे हैं।

चीन और ईरान के बीच एक बेहद महत्वाकांक्षी समझौता दस्तखत होने की कगार पर है। ऐसे में चीन-ईरान का दोस्ती की पींगें बढ़ाना अमरीका के लिए एक ख़तरे की घंटी की तरह से है।

माना जा रहा है कि चीन और ईरान के बीच होने वाले इस महत्वाकांक्षी समझौते से दोनों देशों के बीच संबंध बेहद गहरे और मजबूत हो जाएंगे।

दूसरी ओर, ईरान मध्य पूर्व में अमरीका का सबसे बड़ा दुश्मन है और दोनों देशों के बीच लंबे वक्त से तनावों का दौर जारी है।

अमरीका जहां लगातार ईरान को वैश्विक परिदृश्य में अलग-थलग करने की कोशिशें कर रहा है वहीं चीन ईरान के समर्थन में खड़ा हुआ है और यह हालिया संभावित समझौता मध्य पूर्व में अमरीका की नीतियों पर गहरा असर डालने वाला साबित हो सकता है। अमरीका में राष्ट्रपति चुनावों पर असर डालने की कोशिशों में रूस के साथ चीन और ईरान का भी नाम आ रहा है।

ऐसे में अगर ये दोनों देश एकसाथ आते हैं तो अमरीका के लिए स्वाभाविक तौर पर चिंता बढ़ जाती है।

अमरीका के चीन के साथ रिश्ते पहले से ही मुश्किल दौर में हैं। दूसरी चीज यह है कि जैसा रोल चीन पूरे मिडिल ईस्ट में अमरीका का देखता है उससे उसे इस इलाके में तेल, इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टरों में अपने हितों को लेकर चिंता पैदा होती है। चीन और अमरीका दोनों ही इस इलाके में एक-दूसरे के दबदबे को कायम होते नहीं देखना चाहते हैं।

अठारह पन्ने का दस्तावेज़

चीन और ईरान के होने वाले इस अति-महत्वाकांक्षी समझौते का ब्योरा पहली बार जुलाई की शुरुआत में सामने आया था।

फारसी भाषा में लिखा यह 18 पन्नों का ड्राफ्ट लीक हो गया था और इसे न्यूयॉर्क टाइम्स ने छापा था।

इस प्रस्तावित समझौते में कहा गया है, ''दोनों पार्टनर व्यापार, अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति और सुरक्षा के क्षेत्रों में एक दूसरे को रणनीतिक भागीदार मानेंगे।''

यह लीक हुआ दस्तावेज़ ऐसे वक्त पर सामने आया है जबकि चीन और अमरीका दोनों ही अपने यहां एक-दूसरे के उच्चायोग बंद करने जैसी जवाबी कार्रवाइयों में लगे हुए हैं।

दूसरी ओर, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खमेनेई जनवरी में कुद्स फोर्सेज के कमांडर कासिम सुलेमानी की अमरीकी ड्रोन हमले में हुई मौत का बदला लेने की कसम खा चुके हैं और 27 जुलाई को एक सैटेलाइट इमेज से पता चला कि ईरान ने टारगेट प्रैक्टिस के लिए समुद्र में एक डमी अमरीकी नौसैनिक जहाज़ उतारा था।

मध्य पूर्व में दबदबे की जंग

एक नए बन रहे चीन और ईरान ध्रुव को लेकर अमरीकी प्रशासन में बढ़ती चिंता के बीच दोनों देशों के बीच होने वाले समझौते में ऐसी कई चीजें हैं जिन्हें लेकर अमरीका का आशंकित होना स्वाभाविक है।

यह पूरी जंग मध्य पूर्व में दबदबे की है। कोल्ड वॉर के वक्त यूएस और रूस के बीच कम्युनिस्ट विधारधारा और पूंजीवाद को लेकर जंग थी। मौजूदा वक्त में भी कुछ वैसा ही माहौल है, लेकिन इस बार विचारधारा को लेकर हावी होने का मामला नहीं है।

चीन का बर्ताव बेहद अलग है। चीन का सीधा मतलब बिजनेस से है। उसे मानव अधिकार जैसी चीजों से कोई मतलब नहीं है।

चीन-ईरान डील में क्या है?

ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ ने 5 जुलाई को इस बात की पुष्टि की कि ईरान और चीन एक 25 साल की डील पर बातचीत कर रहे हैं।

लीक हुए ड्राफ्ट के मुताबिक, इस डील के साथ ही एनर्जी, ट्रांसपोर्टेशन, बैंकिंग और साइबर सिक्योरिटी जैसे सेक्टरों में ईरान में चीन के अरबों डॉलर के निवेश का रास्ता साफ हो जाएगा।

इस ड्राफ्ट में हथियारों के विकास, खुफिया जानकारियों को साझा करने और संयुक्त सैन्य अभ्यास जैसे मामलों में भी चीन और ईरान के बीच संभावनाएं तलाशने की बात की गई है।

माना जा रहा है कि इस डील से ईरान को चीन से 400 अरब डॉलर तक का निवेश हासिल हो सकता है।

ईरान पहले से ही चीन के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) में शामिल है। यह चीज चीन की 'डेट ट्रैप डिप्लोमैसी' की तर्ज पर ही है।

ईरान में विरोध

चीन के साथ समझौते को लेकर ईरान में भी विरोध है। ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद समेत कई राजनेता इस समझौते का विरोध कर रहे हैं।

दोनों देशों के बीच इस समझौते को लेकर बातचीत 2016 में ईरान की न्यूक्लियर डील होने के बाद शुरू हो गई थी।

उस वक्त चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ईरान का अपना ऐतिहासिक दौरा किया था और सुप्रीम लीडर अली खमेनेई के साथ मुलाकात की थी।

हालांकि, इस समझौते पर अभी तक ईरान की संसद से हरी झंडी नहीं मिली है और न ही इसे सार्वजनिक ही किया गया है।

इसके अलावा, फारसी भाषा में लिखे गए इस लीक ड्राफ्ट की वैधता की भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

इस डील पर अमरीका की प्रतिक्रिया क्या है?

टाइम्स को दिए गए एक बयान में अमरीकी विदेश विभाग ने चेतावनी दी है कि ईरान के साथ कारोबार करके चीन खुद ही अपने ''स्थिरता और शांति'' को प्रोत्साहित करने के लक्ष्य को नकार रहा है।

अमरीका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने चेतावनी दी है कि चीन-ईरान की इस दोस्ती से मध्य पूर्व में अस्थिरता पैदा होगी।

माना जा रहा है कि चीन और ईरान के बीच संभावित डील से ईरान पर अधिकतम दबाव डालने की ट्रंप प्रशासन की नीति को सीमित कर देगा।

अमरीका की नजदीकी सऊदी अरब के साथ है, जबकि चीन भले ही ईरान के ज़्यादा करीब दिख रहा है, लेकिन उसकी किसी भी देश के साथ कोई दुश्मनी नहीं है। चीन का पूरा फोकस कारोबार पर है।

क्या चीन मध्य पूर्व में अमरीका के दबदबे को चुनौती दे रहा है?

2001 से ही युद्धों पर खर्च किए गए अरबों डॉलर, 8 लाख से ज़्यादा लोगों के मरने और लगातार बनी हुई अस्थिरता के चलते मध्य पूर्व में अमरीका को एक भारी कीमत चुकानी पड़ी है।

असली मसला यह है कि अमरीका का पूरी दुनिया में दबदबा धीरे-धीरे कम हो रहा है। दुनिया के तमाम मसलों में उसकी शिरकत कम हो रही है। दूसरी ओर, चीन लगातार अपनी हैसियत बढ़ाने में जुटा हुआ है। इसे लेकर दोनों में टकराव बढ़ रहा है।

ट्रंप प्रशासन से पहले से अमरीका इस पूरे इलाके में अपनी सैन्य मौजूदगी को कम करने की कोशिशों में लगा हुआ है। और यह नीति नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनावों के बाद भी बदलने वाली नहीं है।

अमरीका की चिंता केवल अपनी इकनॉमी को लेकर नहीं है, उसे अपनी श्रेष्ठता को भी बरकरार रखना है। अमरीका का इस पूरे इलाके में लाखों करोड़ डॉलर का निवेश है।

क्या चीन इस इलाके में खुद को स्थापित करना चाहता है और अमरीका के खाली किए गए स्थान को भरना चाहता है?

अभी तक चीन की कहीं भी अपनी सेनाएं भेजने की नीति नजर नहीं आ रही है। चीन दुनिया में अलग-अलग जगहों पर आर्थिक और इंफ्रास्ट्रक्चर का प्रभाव बढ़ा रहा है। मिडिल ईस्ट में भी उसके इन चीजों से जुड़े हुए हित हैं। चीन अपने आर्थिक हितों तक ही सीमित रहेगा और इस बाद के आसार कम ही हैं कि वह अमरीका के अपनी सैन्य मौजूदगी कम करने के हालात में मध्य पूर्व में अपनी सेनाएं तैनात करेगा।

हालांकि, ऐसी खबरें आई हैं कि चीन ने सीरिया में एक स्पेशल बटालियन भेजी थी। ऐसे में वह आने वाले वक्त में वहां अपनी तैनाती को बढ़ाने का फैसला कर सकता है, हालांकि यह बेहद सीमित पैमाने पर ही होगा।

क्या अमरीका मध्य पूर्व से बाहर निकलना चाहता है?

अभी तक अमरीका का इंटरेस्ट तेल पर कंट्रोल रखने का था। लेकिन, शेल गैस और तेल की खोजों के बाद अमरीका दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उत्पादक और नेट एक्सपोर्टर बन गया है। ऐसे में उसकी तेल पर निर्भरता कम हुई है। इससे मध्य पूर्व पर एनर्जी के लिए उसकी निर्भरता कम हुई है। और इस इलाके की अहमियत अमरीका के लिए घट गई है। दूसरी ओर, चीन के लिए तेल का मुख्य जरिया मध्य पूर्व ही है।

अमरीका और चीन के बीच जारी भूराजनीतिक टकराव के दौर में इस बात के आसार कम ही हैं कि चीन ईरान को अलग-थलग करने के अमरीकी एजेंडे के आगे झुकेगा।

हकीकत तो यह है कि चीन पहले से ही खुल्लमखुल्ला ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा है। वह ईरान से तेल समेत दूसरी चीजों की लगातार खरीदारी कर रहा है।

माना जा रहा है कि चीन ईरान को ट्रंप प्रशासन के जबड़े से निकालने की कोशिश के तहत ये कदम उठा रहा है।

हालांकि, ईरान पर लगाए गए अमरीकी प्रतिबंध उसे अपने परमाणु कार्यक्रम में और ज्यादा पाबंदियों की शर्तें मानने के लिए मजबूर करने में नाकाम रहे हैं। लेकिन, इनका असर यह हुआ है कि ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से हिल गई है।

ईरान और चीन अगले कुछ महीनों में शायद इस डील पर दस्तखत कर देंगे। ईरान के लिए यह समझौता एक लाइफलाइन के जैसा होगा। खासतौर पर अगर ट्रंप दूसरी पारी के लिए चुन लिए जाते हैं तो वैसे हालात में यह डील ईरान के लिए बेहद मददगार साबित होगी।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

खास खबरें

 
किसी भी देश की जीडीपी इस बात पर निर्भर करती है कि लोगों और सरकार के पास पैसा ख़र्च करने के लिए कितना है।...
तुर्की ने पिछले कुछ सालों में अपनी सुरक्षा के लिए काफ़ी ख़र्च किया है और कर रहा है। तुर्की में...
 

खेल

 

देश

 
भारतीय नौसेना के पूर्व प्रमुख एडमिरल रामदास समेत भारत के क़रीब 120 सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों ने भारत...
 
भारत में सुप्रीम कोर्ट ने रिपब्लिक टीवी की टीआरपी मामले की जाँच सीबीआई से करवाने की आग्रह वाली याचिका...