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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020
 
 

आईएमएफ़: भारत की जीडीपी 2020 में -10.3 प्रतिशत गिर सकती है

बुधवार, 14 अक्टूबर, 2020  परवेज़ अनवर, एमडी & सीईओ, आईबीटीएन ग्रुप
 
 
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि साल 2024-25 तक भारत की अर्थव्यवस्था 5 लाख करोड़ अमरीकी डॉलर (5 ट्रिलियन डॉलर) की हो जाएगी। लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा?

13 अक्टूबर 2020 को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने कहा कि भारत की जीडीपी 2020 में -10.3 प्रतिशत जा सकती है। 13 अक्टूबर 2020 को इसका एलान करते हुए आईएमएफ़ ने इस भारी गिरावट की वजह कोरोना महामारी और देशभर में लगे लॉकडाउन को बताया है।

सच्चाई ये है कि मोदी सरकार के द्वारा नोट बंदी और जीएसटी लागू करने के बाद ही भारत की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ख़राब थी और मंदी का शिकार हो चुकी थी। लेकिन कोरोना महामारी और देशभर में लगे लॉकडाउन ने भारत की अर्थव्यवस्था के ताबूत में अंतिम कील ठोका।

31 अगस्त, 2020 को भारत में केंद्र सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार 2020-21 वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच जीडीपी की विकास दर में - 23.9 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

इससे पहले जून 2020 में आईएमएफ़ ने भारत की जीडीपी के -4.5 प्रतिशत तक जाने का अनुमान लगाया था। लेकिन उनकी ताज़ा रिपोर्ट में जून 2020 के आँकड़े को संशोधित करके इसे -10.3 फ़ीसदी कर दिया गया है।

दुनिया भर की उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सूची में भारत की स्थिति सबसे ख़राब बताई गई है। इससे पहले भारत सरकार की तरफ़ से जारी आँकड़ों के मुताबिक़ 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी -23.9 प्रतिशत तक पहुँच गई थी।

भारत से भी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अमरीका के बारे में अनुमान है कि 2020 में यहाँ की जीडीपी -4.3 प्रतिशत तक जा सकती है। आईएमएफ़ की रिपोर्ट में चीन की जीडीपी के बारे में पॉज़िटिव अनुमान लगाया गया है। कहा जा रहा है कि चीन की जीडीपी 2020 में 1.9 प्रतिशत रह सकती है।

एक अनुमान ये भी है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में आने वाले दिनों में बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाएगा।

कांग्रेस पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी ने इस पर चुटकी लेते हुए एक ग्राफ़ ट्वीट कर लिखा है, ''बीजेपी सरकार के पिछले छह साल के नफ़रत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही है: बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ने वाला है।''

आम लोगों पर इसका क्या असर होगा?

इन आँकड़ों का भारत के लोगों के जीवन पर क्या असर पड़ेगा? क्या ये आँकड़े आम जनता को जो परेशानी हो रही है, उसे दर्शाते हैं?

सांख्यिकीविद प्रणव सेन इन आँकड़ों को आसान भाषा में समझाते हुए कहते हैं, ''इसका मतलब ये है कि पिछले साल के मुक़ाबले इस साल आम जनता की आमदनी तकरीबन 20 लाख करोड़ कम होगी। ज़ाहिर है जब आमदनी कम होगी, तो ख़र्च भी आप कम करेंगे।''

प्रणव सेन, भारत में केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय में मुख्य सांख्यिकीविद रह चुके हैं।

20 लाख करोड़ रुपये की रक़म कोई छोटी रक़म नहीं है। ये रक़म कई छोटे देशों की पूरी अर्थव्यवस्था का आकार है। जब आमदनी और ख़र्च कम होगा, तो लोगों के रहन-सहन पर इसका असर पड़ेगा। लोग अपने बचत खाते से पैसे निकालने के लिए मजबूर होंगे।

लेकिन असली दिक़्क़त उन लोगों को होगी, जो रोज़ कमाते है और रोज़ ख़र्च करते हैं। यानी जिनके पास बचत खाता के नाम पर कुछ नहीं होता। आमदनी और ख़र्च के अलावा इसका असर निवेश पर भी पड़ेगा।

सेन आगे कहते हैं, ''ऐसी परिस्थिति में जब लोगों के ख़र्च करने की क्षमता कम हो गई हो, तो नए निवेश आने में परेशानी होगी। निवेश करने वाला पहले ये पूछता है कि आख़िर उसके उत्पादन का ख़रीदार कौन होगा? और अगर पहले से पता हो कि ख़रीदार बाज़ार में नहीं है, तो निवेश करने का प्लान, निवेशक टाल देता है। इस वजह से नए रोज़गार के अवसर कम मिलेंगे और इसका सीधा असर युवाओं के रोज़गार पर पड़ेगा।''

यानी कुल मिला कर आईएमएफ़ ने जो कहा है, इसका मतलब है कि आम जनता की आमदनी कम होगी, जिससे उनके ख़र्च करने की क्षमता कम होगी, जिससे निवेशक बाज़ार में कम पूँजी लगाएँगे। इस वजह से रोज़गार के अवसर कम पैदा होंगे। ये अपने आप में ऐसा चक्र है, जिससे निकलना किसी देश के लिए आसान नहीं होगा।

एक बार फिर उस सवाल पर आते जो हमने शुरू में उठाया था। क्या साल 2024-25 तक भारत की अर्थव्यवस्था 5 लाख करोड़ अमरीकी डॉलर (5 ट्रिलियन डॉलर) की हो जाएगी? आईएमएफ की रिपोर्ट में इस वक़्त दुनिया भर की उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सूची में भारत की अर्थव्यवस्था की स्थिति सबसे ख़राब बताई गई है। जाहिर है कि भारत के लिए अब इस लक्ष्य को पाना मुश्किल है। भविष्य में क्या होगा? इसके बारे में कुछ भी अनुमान लगाना असंभव है। भारत का भविष्य मोदी सरकार, बीजेपी-आरएसएस की नीतियों, विपक्षी पार्टियों की भूमिका, भारत की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी की भूमिका, दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक व सामरिक हालात, भारत के अंतर राष्ट्रीय सम्बन्ध (खासकर अपने पड़ोसियों के साथ) पर निर्भर है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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