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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020
 
 

क्या भारत के जीडीपी की तुलना बांग्लादेश से करना सही है?

वृहस्पतिवार, 15 अक्टूबर, 2020  आई बी टी एन खबर ब्यूरो
 
 
13 अक्टूबर 2020 को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने कहा कि भारत की जीडीपी 2020 में -10.3 प्रतिशत जा सकती है। 13 अक्टूबर 2020 को इसका एलान करते हुए आईएमएफ़ ने इस भारी गिरावट की वजह कोरोना महामारी और देशभर में लगे लॉकडाउन को बताया है।

सच्चाई ये है कि मोदी सरकार के द्वारा नोट बंदी और जीएसटी लागू करने के बाद ही भारत की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत ख़राब थी और मंदी का शिकार हो चुकी थी। लेकिन कोरोना महामारी और देशभर में लगे लॉकडाउन ने भारत की अर्थव्यवस्था के ताबूत में अंतिम कील ठोका।

31 अगस्त, 2020 को भारत में केंद्र सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय के अनुसार 2020-21 वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच जीडीपी की विकास दर में - 23.9 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

आईएमएफ़ का अनुमान ये भी है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में आने वाले दिनों में बांग्लादेश भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाएगा। इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 14 अक्टूबर 2020 को एक ट्वीट भी किया।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ''बीजेपी सरकार के पिछले छह साल के नफ़रत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे ठोस उपलब्धि यही रही है: बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ने वाला है।''

इसके साथ ही उन्होंने एक ग्राफ़ भी ट्वीट किया, जिसमें बांग्लादेश, भारत और नेपाल के प्रति व्यक्ति जीडीपी का तुलनात्मक अध्ययन दिखाया गया है।

इस ग्राफ़ में साल 2020 के लिए बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति जीडीपी 1876.5 डॉलर दिखाया गया है और भारत के लिए 1888.0 डॉलर दिखाया गया है।

इस पर जाने माने अर्थशास्त्री कौशिक बासु ने ट्विटर पर लिखा, ''आईएमएफ़ के अनुमान के मुताबिक़ प्रति व्यक्ति जीडीपी में बांग्लादेश भारत को 2021 में पीछे छोड़ देगा। उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देश इतना अच्छा कर रहे हैं, ये अच्छी ख़बर है। लेकिन भारत के लिए ये आँकड़े चौंकाने वाले हैं। पाँच साल पहले तक बांग्लादेश भारत से 25 फ़ीसदी पीछे था। देश (भारत) को बोल्ड राजकोषीय/ मौद्रिक नीति की ज़रूरत है।''

क्या भारत के जीडीपी की तुलना बांग्लादेश से करना सही है?

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की जीडीपी का अनुमान -10.3 प्रतिशत लगाया है, वहीं बांग्लादेश के लिए ये अनुमान 3.8 प्रतिशत लगाया है। बांग्लादेश के अलावा चीन और म्यांमार की जीडीपी के बारे में पॉज़िटिव अनुमान लगाया गया है।

अर्थव्यवस्था के लिहाज से चीन, भारत से हमेशा बेहतर स्थिति में रहा है। इसलिए लोग अब बांग्लादेश के साथ ही भारत की तुलना करने में लगे हैं।

राहुल गांधी के ट्वीट के बाद भारतीय मीडिया में सरकारी सूत्रों के हवाले से ख़बर छपी कि भारत की जनसंख्या बांग्लादेश के मुक़ाबले 8 गुना बड़ी है। दूसरी बात ये कि 2019 में भारत की ख़रीदने की क्षमता 11 गुना अधिक थी।

प्रति व्यक्ति जीडीपी यह बताती है कि किसी देश में प्रति व्यक्ति के हिसाब से आर्थिक उत्पादन कितना है? इसकी गणना किसी देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को उस देश की कुल जनसंख्या को भाग देकर निकाला जाता है।

प्रोफ़ेसर प्रबीर डे इंटरनेशनल ट्रेड और इकोनॉमी के जानकार हैं। भारत में रिसर्च एंड इंफ़ॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर डेवलपिंग कंट्री (आरआईएस) में प्रोफ़ेसर हैं।

प्रबीर डे ने कहा कि कोरोना की वजह से पहली तिमाही के दौरान दक्षिण एशियाई देशों में भारत की जीडीपी सबसे ज़्यादा प्रभावित थी। ये (माइनस) -23.9 प्रतिशत तक पहुँच गई थी। जबकि बांग्लादेश और चीन की जीडीपी में गिरावट भारत के मुक़ाबले काफ़ी कम थी। भारत में जिस स्तर का लॉकडाउन लगाया गया था, वैसा दूसरे देशों में नहीं था। इसका भी असर आईएमएफ़ के ताज़ा अनुमान में देखने को मिला है।

लेकिन प्रबीर डे साथ ही ये भी कहते हैं कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से उभर रही है, इसमें कोई दो राय नहीं हैं।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था

1971 में पाकिस्तान से आज़ादी के बाद बांग्लादेश ने कई त्रासदियों को झेला है। बांग्लादेश ने 1974 में भयानक अकाल देखा। भयावह ग़रीबी और प्राकृतिक आपदा से बांग्लादेश जूझता रह। अगस्त 2017 से शरणार्थी संकट से बांग्लादेश जूझ रहा है। तब से लाखों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमान पड़ोसी बर्मा से अपना घर-बार छोड़ बांग्लादेश में आ गए हैं।

बांग्लादेश की जनसंख्या तकरीबन 17 करोड़ के आसपास है।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में दो बातों का सबसे बड़ा योगदान है। पहला कपड़ा उद्योग और दूसरा विदेशों में काम करने वाले लोगों का भेजा पैसा।

मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में बांग्लादेश तेज़ी से प्रगति कर रहा है। कपड़ा उद्योग में बांग्लादेश चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। बांग्लादेश में बनने वाले कपड़ों का निर्यात सालाना 15 से 17 फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है।

2018 में जून महीने तक कपड़ों का निर्यात 36.7 अरब डॉलर तक पहुँच गया। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का लक्ष्य है कि 2021 में बांग्लादेश जब अपनी 50वीं वर्षगांठ मनाए, तो यह आँकड़ा 50 अरब डॉलर तक पहुँच जाए।

दूसरी तरफ़ भारत में मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में पिछले दिनों सबसे ज़्यादा गिरावट देखने को मिली है। पहली तिमाही में मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर ग्रोथ -39.3 फ़ीसदी रहा था।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में विदेशों में काम करने वाले क़रीब 25 लाख बांग्लादेशियों की भी बड़ी भूमिका है। विदेशों से ये जो पैसे कमाकर भेजते हैं, उनमें सालाना 18 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हो रही है और 2019 में ये राशि 19 अरब डॉलर तक पहुँच गई।

लेकिन कोरोना महामारी की वजह से दोनों ही क्षेत्रों में नकारात्मक असर पड़ा है।

बांग्लादेश में कोरोना का हाल

बांग्लादेश में कोरोना का पहला मामला 8 मार्च 2020 को आया। 23 मार्च 2020 को वहाँ की सरकार ने ऐलान किया कि 26 मार्च 2020 से 30 मई 2020 तक सरकारी छुट्टी रहेगी। बैंक कम समय के लिए ही सही, वहाँ काम कर रहे थे। 8 अप्रैल 2020 को रोहिंग्या कैम्प में भी सरकारी पाबंदियाँ लगा दी गई थी। 31 मई 2020 से बांग्लादेश में ज़्यादातर चीज़े खुल गई थी।

जबकि भारत में जनवरी 2020 के अंत में कोरोना का पहला मामला सामने आया था। 24 मार्च 2020 से पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन लगाया गया। उससे पहले ही कई राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर दूसरी पाबंदियाँ लगानी शुरू कर दी थी।

पहली बार लॉकडाउन के दौरान 15 अप्रैल 2020 से कुछ इलाक़ों में आर्थिक गतिविधियों की छूट दी गई। वहीं 30 सितंबर 2020 तक कई चीज़ों पर कोरोना महामारी की वजह से कुछ न कुछ पाबंदियाँ लगी ही रही।

आईएमएफ़ के मुताबिक़ बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था कोरोना के दौर में दो वजहों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है। पहला है रेमिटेंस (विदेशों में काम करने वाले देश में जो पैसा भेजते हैं) में कमी। रेमिटेंस का पैसा उनके देश की कुल जीडीपी का 5 प्रतिशत हिस्सा है।

दूसरी वजह है उनके रेडीमेड कपड़ों के निर्यात में कमी। रेडीमेड कपड़ों का निर्यात, बांग्लादेश के कुल निर्यात का 80 फ़ीसदी है। इसके अलावा बारिश और बाढ़ ने भी कृषि को वहाँ काफ़ी नुक़सान पहुँचाया है।

वहीं भारत के लिए आईएमएफ़ ने जीडीपी में भारी गिरावट की वजह कोरोना महामारी और देशभर में लगे लॉकडाउन को बताया है।

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था कैसे फल फूल रही है?

बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग के लिए साल 2013 में राना प्लाज़ा आपदा किसी बड़े झटके से कम नहीं थी। कपड़ों की फ़ैक्टरी की यह बहुमंज़िला इमारत गिर गई थी और इसमें 1,130 लोग मारे गए थे। इसके बाद कपड़े के अंतरराष्ट्रीय ब्रैंड कई तरह के सुधारों के लिए मजबूर हुए।

उसके बाद से बांग्लादेश सरकार ने नियम क़ानून में कई तरह के बदलाव किए, फ़ैक्टरियों को अपग्रेड किया गया और इसमें काम करने वाले कामगारों की स्थिति में बेहतरी के लिए कई क़दम उठाए गए।

बांग्लादेश में कपड़ों की सिलाई का काम व्यापक पैमाने पर होता है और इसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल हैं। 2013 के बाद से अब ऑटोमेटेड मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है।

प्रोफ़ेसर प्रबीर डे का मानना है कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के फलने फूलने के कई कारण है।

पहली बात है कि बांग्लादेश अभी विकासशील देशों की लिस्ट में हैं। मतलब अभी विकास की गुंजाइश बची है।

दूसरी बात बांग्लादेश में भारत जैसे मतभेद नहीं है। भारत में केंद्र सरकार एक बात कहती है, तो राज्य की सरकारें इसका विरोध करती हैं।

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री ने जो बोल दिया, वो सब मानते हैं। राजनीतिक विरोध वहाँ भी होते हैं, लेकिन डोमिसाइल, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, राज्य के आधार पर वहाँ विभाजन भारत जैसा नहीं हैं।

तीसरी बात अर्थशास्त्री कौशिक बसु कहते हैं। वहाँ महिलाओं का सशक्तिकरण भी तेज़ी से हो रहा है। बांग्लादेश की सियासत में दो महिलाओं शेख हसीना और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया का प्रभुत्व रहा है। कपड़ा उद्योग में भी महिलाओं की भागीदारी ख़ूब है। समाज में महिलाएँ जब आगे रहती हैं, तो समाज में प्रगति बेहतर होती है। प्रबीर डे भी ऐसा ही मानते हैं।

चौथी बात जो बांग्लादेश के पक्ष में है, वो है उनकी मार्केट वैल्यू। दुनिया भर में मेड इन बांग्लादेश कपड़ों की अलग और अच्छी पहचान है। इसके लिए बांग्लादेश सरकार के गवर्नेंस सिस्टम को श्रेय दिया जाना चाहिए। एक बार जिस देश को बांग्लादेश सामान बेचता है, वो देश दोबारा बांग्लादेश के पास जाता है।

बांग्लादेश सरकार का शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन पर ख़र्च बेहतर है। इस बात की तस्दीक अलग-अलग ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स भी करते हैं, जिसमें बांग्लादेश भारत से आगे हैं।

किसी भी देश की जीडीपी इस बात पर निर्भर करती है कि लोगों और सरकार के पास पैसा ख़र्च करने के लिए कितना है। वहाँ की सरकार ने अलग-अलग योजनाएँ चला कर पानी, बिजली, ग्रामीण इलाक़ों में बैंक, इन सब व्यवस्थाओं पर कितना ध्यान दिया है।

इस ख़र्च को सरकार ने अपने अकाउंट में दिखाया और उसी वजह से जीडीपी के आँकड़े बेहतर हैं।

हालाँकि प्रबीर डे का कहना है, ''एफडीआई और ईज़ ऑफ़ डुइंग बिज़नेस में बांग्लादेश थोड़ा पीछे है। परियोजनाओं के लिए वहाँ फ़ास्ट ट्रैक क्लियरेंस की सुविधा नहीं है। बांग्लादेश में केस टू केस आधार पर सरकार अनुमति देती है। फिर भी कोरोना के दौर में चीन से निकल कर 16 जपानी कंपनियों ने बांग्लादेश में अपनी इंडस्ट्री लगाई है। ढाका से 30 किलोमीटर की दूरी पर होंडा कंपनी ने अपना एक प्लांट हाल ही में लगाया है। ये सभी बातें बताती है कि वहाँ की सरकार के साथ बिज़नेस करने के लिए दूसरे देश इच्छुक हैं। लोकल कंपनियाँ को वहाँ 'भूमिपुत्र' की संज्ञा दी जाती है। ऐसी कंपनियाँ भी वहाँ काफ़ी बड़ी संख्या में फल फूल रही हैं।''

बांग्लादेश की जीडीपी ग्रोथ भारत से बेहतर कैसे? इसका जवाब एक लाइन में प्रबीर देते हैं।

प्रबीर कहते हैं, ''बांग्लादेश की सरकार ने अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सीढ़ी के रास्ते ऊपर चढ़ने की कोशिश की है, ना कि भारत की तरह लिफ़्ट का रास्ता चुना। लिफ़्ट में तकनीकी ख़राबी से आप एक जगह रुक सकते हैं, लेकिन सीढ़ी हो तो उतरना-चढ़ना ज़्यादा आसान होता है।''

यही दोनों देश की अर्थव्यवस्था में बुनियादी फ़र्क है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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