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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020
 
 

ट्रंप-अर्दोआन दोस्ती: क्या तुर्की एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में उभर रहा है?

शुक्रवार, 16 अक्टूबर, 2020  आई बी टी एन खबर ब्यूरो
 
 
अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में वैसे तो दुनिया भर की दिलचस्पी है, लेकिन तुर्की इस पर पैनी नज़र बनाए हुए है।

एक ओर जहाँ तुर्की अपने प्रभाव क्षेत्र में विस्तार करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमरीका के प्रभाव में आई कमी को वो एक अवसर के तौर पर देख रहा है।

ट्रंप के कार्यकाल में अमरीका ने अपनी परंपरागत भूमिका से पीछे हटते हुए ऐसी ख़ाली जगह बना दी है, जिसे भरने की कोशिश कई देश कर रहे हैं। अन्य देशों की तरह तुर्की भी अपने आसपास के क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में है।

तुर्की के अधिकारी इस क़दम की सराहना कर रहे हैं, उन्हें लगता है उनका देश फिर से पहले की तरह एक महान ताक़त बन सकेगा।

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने तीन अक्तूबर 2020 को कहा था, ''जैसे तुर्की विकसित हो रहा है, आगे बढ़ रहा है और मज़बूत हो रहा है, वह विश्व मंच पर अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है।''

उन्होंने अपने भाषण में दोस्तों के साथ खड़े रहने का वादा भी किया था। लेकिन तुर्की एकमात्र ऐसा देश नहीं है, जो मौजूदा स्थिति का फ़ायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। कई ऐसे देश हैं, जो इस बदलती परिस्थिति में अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन के बीच घनिष्ठ संबंध व्यापक रणनीति पर आधारित है। तुर्की ने अपने नेटो सहयोगियों के साथ बढ़ती असहमति के ख़िलाफ़ इसे एक ढाल के तौर पर इस्तेमाल किया है।

जब तुर्की ने रूस से एस-400 मिसाइलें ख़रीदीं, तो अमरीकी संसद तुर्की पर प्रतिबंध लगाना चाहती थी, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप ने तुर्की को बचा लिया।

जर्मन मार्शल फ़ंड के तुर्की निदेशक ओज़गुर उनलुहिसारसिक्ली मानते हैं कि बिगड़ते रिश्तों के बीच अमरीका में ट्रंप ही तुर्की के एकमात्र दोस्त हैं। सितंबर 2019 में राष्ट्रपति अर्दोआन ने न्यूयॉर्क में कहा था, ''हम इन मुश्किल हालातों से अपने प्यारे दोस्त ट्रंप के साथ संबंधों के कारण ही बाहर निकल रहे हैं।''

तुर्की की मीडिया ने ट्रंप के प्रतिद्वंद्वी और डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडन के उस बयान की निंदा की, जिसमें उन्होंने तुर्की को लेकर मानवाधिकार हनन के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाने और सख़्त विदेश नीति की बात कही थी।

अगस्त 2020 में जो बाइडन ने कहा था कि अर्दोआन के लिए उनका दृष्टिकोण बिल्कुल अलग होगा। उन्होंने अपने भाषण में यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वे तुर्की में विपक्षी नेतृत्व का समर्थन करेंगे।

बाइडन के इस बयान के बाद से तुर्की के कई विश्लेषक ट्रंप का समर्थन करते दिख रहे हैं। तुर्की सरकार की ओर झुकाव रखने वाले अख़बार सबाह के स्तंभकार मेहमत बरलास लिखते हैं, ''मैं ट्रंप की कमज़ोरियों से वाक़िफ़ हूँ, लेकिन अगर हमें चुनना हो तो यह हमारे हित में होगा कि राष्ट्रपति ट्रंप दोबारा चुनकर आएँ।''

राष्ट्रपति ट्रंप के साथ तुर्की के मैत्रीपूर्ण संबंध सिर्फ़ द्विपक्षीय मुद्दों तक ही सीमित नहीं हैं।

तुर्की ऐसे समय में अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है, जब राष्ट्रपति ट्रंप अंतरराष्ट्रीय अभियानों से अमरीका को पीछे हटाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

इसका एक उदाहरण अक्तूबर 2019 में सीरिया में तुर्की की सेना के हस्तक्षेप के तौर पर देखने को मिला था।

अमरीकी सेना इस्लामिक स्टेट समूह के ख़िलाफ़ सीरियाई कुर्द के साथ मिलकर लड़ रही थी। लेकिन ट्रंप और अर्दोआन के बीच फ़ोन पर हुई बातचीत के बाद, जो इलाक़े तुर्की के निशाने पर थे, वहाँ से अमरीकी सेना पीछे हट गई। तुर्की समर्थित सेना, रूसी सेना और सीरियाई सरकार ने बाद में उत्तर-पूर्वी सीरिया के इलाक़ों पर नियंत्रण कर लिया।

तुर्की और अमरीका कई मुद्दों पर एक-दूसरे को सहयोग कर रहे हैं। तुर्की लीबिया में अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहता है। हालाँकि तुर्की में कई लोगों का मानना है कि ट्रंप का दूसरा कार्यकाल अमरीका के दुनिया से अलगाव को और गहरा करेगा, जिससे तुर्की के लिए और संभावनाएँ पैदा होंगी।

साल 2016 में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव के कुछ महीनों पहले तुर्की के राष्ट्रपति के संचार निदेशक फ़्रेटन एलेन ने कहा था कि अमरीका की विस्तारवादी नीतियों को समाप्त करने के लिए ट्रंप की प्रतिबद्धता अवसर पैदा कर सकती है।

सबाह अख़बार के स्तंभकार हसन बासरी यालसिन कहते हैं कि तुर्की इस क्षेत्र में सबसे शक्तिशाली देश के रूप में उभर रहा है।

18 जून 2020 को हसन बासरी ने लिखा, ''दुनिया बदल गई है। तुर्की बदल गया है। अमरीका को केंद्र मानकर उसके चारों ओर घूमने वाला नब्बे का दशक बदल गया है।''

वो आगे लिखते हैं, ''अमरीका अब कुछ भी नहीं करना चाहता है, क्योंकि वो कमज़ोर हो रहा है और तुर्की एक मज़बूत प्रभाव बनने की ओर स्पष्ट रूप से उभर रहा है।''

समाचार वेबसाइट हेबर्टर्क के एक स्तंभकार सेटिनर सेटिन कहते हैं, ''अपने पारंपरिक पश्चिमी दोस्तों से अलगाव को वास्तव में तुर्की के परिप्रेक्ष्य में अपने 'आवरण को तोड़ने' और 'डर की दीवार को गिराने' की प्रक्रिया के तौर पर देखा जाना चाहिए।''

येनी शफ़ाक़ अख़बार के प्रधान संपादक इब्राहिम कारागुल कहते हैं, ''आज तुर्की इस क्षेत्र में एक उभरती हुई शक्ति है, जो 20वीं सदी की स्थापित संरचना को बदल रहा है।''

तुर्की में सरकार विरोधी आवाज़ें भी बदलती स्थिति को महसूस कर रही हैं।

तुर्की एकमात्र ऐसा देश नहीं है, जो अमरीका के पीछे हटने के कारण बने ख़ालीपन को भरने की कोशिश कर रहा है।

पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में शक्ति संघर्ष जारी है, जहाँ फ़्रांस, रूस, मिस्र, इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई देश अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं।

संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के कई मुद्दों पर तुर्की के साथ मतभेद हैं।

फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी मध्य पूर्व में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। लेबनान और इराक़ की उनकी हाल की यात्राओं को उसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर तुर्की फ़्रांस के इन प्रयासों की आलोचना कर रहा है और उसने इसे औपनिवेशिक और दमनकारी नीति से जोड़ा है।

अमरीकी चुनावों में ट्रंप जीतें या फिर बाइडन, वैश्विक स्तर पर जो प्रतिस्पर्धा दिख रही है, वो आगे भी जारी रहेगी।

तुर्की समाचार वेबसाइट मीडियास्कोप के एक स्तंभकार रुसेन लिखते हैं, ''बाइडन अमरीका को पुराने तरीक़ों से वापस लाने की कोशिश कर सकते हैं और विश्व संस्थानों में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।''

वह लिखते हैं, ''अमरीका का वैश्विक प्रभुत्व कम हो रहा है और ऐसा नहीं लग रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप को इस बात से कोई फ़र्क पड़ेगा कि वे व्हाइट हाउस में रहते हैं या नहीं।''

लेकिन तुर्की की आकांक्षाएँ ट्रंप सरकार तक सीमित नहीं हैं।

तुर्की ने पिछले कुछ सालों में अपनी सुरक्षा के लिए काफ़ी ख़र्च किया है और कर रहा है। तुर्की में राष्ट्रवादी भावनाओं का उदय हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में निश्चित तौर पर इसके प्रभाव में और विस्तार हो सकता है।

नवंबर 2020 में होने वाले चुनाव के बाद जो भी व्हाइट हाउस पहुँचे, वो चाहें ट्रंप हों या बाइडन, लेकिन तुर्की अपना प्रभुत्व बढ़ाना जारी रखेगा।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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