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रविवार, 17 जनवरी 2021
 
 

मोदी सरकार मौजूदा कृषि कानून रद्द करे, किसानों के साथ मिलकर नया कानून बनाए: अजित सिंह

मंगलवार, 12 जनवरी, 2021  आई बी टी एन खबर ब्यूरो
 
 
राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष और भारत के पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री चौधरी अजित सिंह ने कहा है कि मोदी सरकार को मौजूदा कृषि कानून रद्द करके नया कानून बनाना चाहिए जिसे वह किसानों से बात करके तैयार करे और संसद की सलेक्ट कमिटी में भेजे।

बीबीसी के मुताबिक बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय से उन्होंने खुलकर इस कानून की कमियों पर बात की और बताया कि किसान क्यों इस कानून से डरे हुए हैं?

उन्होंने कहा, ''पहली बात तो ये है कि ये कानून बड़ी जल्दी में पास किए गए हैं। अध्यादेश लाया गया, किसानों के किसी समूह से बात नहीं की गई, पास करने से पहले ये बिल सलेक्ट कमिटी में नहीं गया और राज्यसभा में तो क़ायदे से वोटिंग भी नहीं कराई गई, ध्वनि मत से जबरन पास कराया गया।''

''अब जब बीते 47 दिन से किसान सड़कों पर बैठे हैं, साठ लोग मर चुके हैं और सरकार की ओर से दुख तक प्रकट नहीं किया गया। सरकार का मक़सद धीरे-धीरे एमएसपी और मंडी सिस्टम को ख़त्म करना है। देखिए सरकार कहती है एमएसपी बढ़ा रहे हैं लेकिन एमएसपी पर खरीदारी बिलकुल नहीं होती है। धान का दाम 1900 रुपये हैं। बाज़ार में 1100 रुपये में मिल रहा है, यही हाल सभी फ़सलों का है, महज़ 6 फ़ीसदी किसानों को एमएसपी मिल पा रही है।''

''जो सरकारी संस्था है फ़ूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदारी करती है। जब मनमोहन सरकार का कार्यकाल ख़त्म हुआ था तो उस वक़्त एफ़सीआई पर 11 हज़ार करोड़ से ज़्यादा का कर्ज़ था। ये 10 साल में किया गया कर्ज़ था। आज ये कर्ज़ तिगुना हो चुका है। बजट में एफ़सीआई के लिए जो रक़म तय की जाती है सरकार उस रकम को भी मुहैया नहीं कराती।''

''एफ़सीआई अगर दिवालिया हो जाए तो क्या होगा? आपने (मोदी सरकार ने) बड़े-बड़े व्यापारियों को स्टोरेज का विकल्प दे दिया तो वो अगर स्टोर करेंगे तो दाम भी वही तय करेंगे। तो होगा ये कि जब फ़सल बाज़ार में आएगी तो वे दाम गिरा देंगे और जब फ़सल आनी बंद हो जाएगी तो वो दाम चढ़ा देंगे, यही समस्या है।''

''दूसरा सरकार कहती है कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग। देखिए कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग में दाम सरकार तय करती है और ये भी तय करती है कि किसान को वही दाम मिले। आपको क्या लगता है 2-3 एकड़ की ज़मीन वाला किसान सही दाम ना मिलने पर कोर्ट जा कर लड़ पाएगा, लाखों केस कोर्ट में पड़े हुए हैं।''

''देखिए देश में बड़े से बड़े अर्थशास्त्रियों को किसानों के अर्थशास्त्र से कोई मतलब नहीं रहा है नतीजा ये है कि किसानों की मासिक औसत आय 8 हज़ार रुपये है। इस रक़म में काम हो सकता है?''

''सरकार इस कानून को रद्द करके फिर से किसानों से बात कर नया कानून बनाए और इसे सलेक्ट कमिटी के भेजे। इसमें परेशानी क्यों है? और सरकार को जल्दी क्यों है?''

सरकार को कौन सा नया सिस्टम अपनाना चाहिए इसके जवाब में वह कहते हैं, ''सरकार कहती है कि हमने एमएसपी बढ़ा दी है, 1965 में जब एमएसपी एक प्रशासनिक नोटिफिकेशन के ज़रिए लाया गया था तो उसमें ये था कि धान-गेहूं या जो भी फ़सल एमएसपी सिस्टम में है उसे सरकार को खरीदना होगा। आज सरकार ने खरीदना क़रीब-क़रीब बंद कर दिया गया है। भंडारण की सीमा इसलिए तय की गई थी ताकि बड़े बड़े कॉरपोरेट घराने इसका भंडारण ना कर सकें। अगर एफ़सीआई दिवालिया हो गई और सरकार ने भंडारण बंद कर दिया तो किसान की हालत दयनीय हो जाएगी। पहले तो सरकार को एमएसपी पर किसानों से फ़सल खरीदने का काम करना चाहिए। लिखने कर देने से क्या होता है सरकार लिख कर दे देगी लेकिन खरीद तो नहीं रही है। कानूनी जामा आपको देना होगा और कहना होगा कि एमएसपी से कम दाम में कॉरपोरेट भी नहीं खरीद सकता तो समस्या वहीं हल हो जाएगी।''

''मौजूदा मोदी सरकार की तुलना किसी भी पुरानी सरकार से नहीं की जा सकती। एक किस्सा सुनाता हूं - साल 2009 में यूपीए सरकार एक अध्यादेश लाई कि गन्ने की जो राज्यों की तय की गई कीमत है उसे हटाकर केंद्र की तय कीमत पर खरीद की जाए, जो राज्य की कीमत से कम थी। सभी पार्टियों ने दिल्ली को घेरने का काम किया और दो दिन में ही सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिया। लेकिन ये सरकार तो सुनने को तैयार ही नहीं है।''

''मैं मानता हूं कि मंडी सिस्टम में ख़ामियां है लेकिन सरकार तो मंडी ही ख़त्म कर देगी। इसका एक ही रास्ता है कि कानून रद्द हो और फिर से किसानों से बात करके नया कानून बनाया जाए।''
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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