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भारतीय अर्थव्यवस्था में अब भी गड़बड़ी

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि भारत ने अर्थव्यवस्था की बुनियादी बातों पर काम किया है लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें हैं जो लंबी अवधि के विकास के लि...

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भारत-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएफ़-बीजीबी के बीच फ़ायरिंग

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क्या दुनिया के 5G नेटवर्क पर चीन के कब्जे को अमेरिका रोक पायेगा?

5G तकनीक हाई स्पीड इंटरनेट सर्विस का वादा करती है और इसकी मदद से यूजर किसी फ़िल्म को महज कुछ सेकेंड में डाउनलोड कर लेते हैं। दुनिया के कई हिस्सों में इसकी शुरुआत हो चुकी है।

4G ने लोगों के अनुभवों को बहुत बदल दिया, ख़ासकर मोबाइल वीडियो और गेमिंग के अनुभव को। 5G और बदलाव लाएगा।

अमरीका और ब्रिटेन में 5G नेटवर्क की शुरुआत पर ख्वावे पर लगे प्रतिबंधों का भी असर पड़ा है।

सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अमेरिका ने चीनी कंपनी ख्वावे के उपकरणों का 5G नेटवर्क में इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है और अपने सहयोगियों को भी ऐसा करने की सलाह दी है।

अमरीकी कंपनियां ख्वावे को क्या बेच सकती हैं, इस पर भी नियंत्रण रखा जा रहा है। यही कारण है कि दुनियाभर में ख्वावे के फोन की बिक्री में गिरावट आई है।

वित्तीय सेवा समूह जेफरीज के विश्लेषक और इंडस्ट्री के जानकार एडिसन ली इसे दुनिया के 5G बाजार पर अमरीका के प्रभुत्व जमाने की कोशिश के रूप में देखते हैं।

वो मानते हैं कि ख्वावे पर अमरीका ने दबाव इसलिए बनाया है ताकि चीन को इस क्षेत्र में बादशाह बनने से रोका जा सके।

वो कहते हैं, "इस टेक वॉर के पीछे अमरीका का तर्क है कि चीन बौद्धिक संपदा की चोरी कर तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है और सरकार इस पर बेतहाशा ख़र्च कर रही है। उसका मानना है कि चीनी दूरसंचार उपकरण सुरक्षित नहीं हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है।''

वो आगे जोड़ते हैं, "जैसे-जैसे दूरसंचार उपकरण के वैश्विक बाजार में ख्वावे और ZTE का दखल बढ़ता जाएगा, पश्चिम के देश जासूसी का मुद्दा जोर-शोर से उठाएंगे।''

ख्वावे ने हमेशा इन आरोपों को खारिज किया है कि उसकी तकनीक का इस्तेमाल जासूसी के लिए किया जा सकता है।

एक ओर जहां पश्चिम के देश ख्वावे को लेकर चिंतित हैं, वहीं दूसरी ओर चीन इस क्षेत्र में काफी आगे बढ़ गया है।

31 अक्तूबर को चीन की दूरसंचार कंपनियों ने 50 से ज़्यादा शहरों में 5G सेवा की शुरुआत की, जिसके बाद यहां दुनिया का सबसे बड़ा 5G नेटवर्क अस्तित्व में आया। इसका क़रीब 50 फ़ीसदी हिस्सा ख्वावे ने तैयार किया है।

चीन के सूचना मंत्रालय का दावा है कि महज 20 दिनों में इस सेवा से 8 लाख से ज़्यादा लोग जुड़े हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि चीन में 2020 तक 11 करोड़ 5G यूजर होंगे।

चीन अब इस नई तकनीक के नई तरह के इस्तेमाल पर काम कर रहा है।

उत्तरी हॉन्गकॉग के एक बड़े भूभाग पर शोधकर्ता वैसी गाड़ियां विकसित कर रहे हैं, जो 5G की मदद से खुद चलेंगी।

हॉन्गकॉन्ग एप्लाइड साइंस एंड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूशन के शोधकर्ता चीन की सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी चाइना मोबाइल के साथ मिल कर यह काम कर रहे हैं।

वे मानते हैं कि सेल्फ ड्राइविंग कार यानी खुद से चलने वाली कारों के लिए 5G उपयोगी साबित हो सकती है। इसके ज़रिए सड़कों पर गाड़ियां एक-दूसरे से बेहतर संपर्क स्थापित कर पाएंगी, साथ में इसका भी सटीक पता चल पाएगा कि आसपास क्या चल रहा है।

5G की शुरुआत करने वाला चीन दुनिया का पहला देश नहीं है। कई अन्य देश इसकी शुरुआत पहले कर चुके हैं, लेकिन इसने जिस तेज़ी से वैश्विक बाजार में अपना प्रभुत्व जमाया है, पश्चिम के देश इसे लेकर खासा चिंता में हैं।

ख्वावे और ZTE जैसी कंपनियां इसका भरपूर फायदा उठा रही हैं और विदेशी बाज़ारों में अमरीका को टक्कर दे रही हैं।

नवंबर में बीजिंग में हुए 5G सम्मेलन में चीन के उद्योग और सूचना मंत्री ने आरोप लगाया था कि अमरीका साइबर सिक्योरिटी का इस्तेमाल अपनी कंपनियों को संरक्षण देने के लिए कर रही है।

मियाओ वी ने कहा था, "किसी भी देश को इसके 5G नेटवर्क के विस्तार में किसी कंपनी को सिर्फ़ आरोपों के आधार पर रोका नहीं जाना चाहिए, जो कभी सिद्ध नहीं किए गए हों।''

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क्या दुनिया के 5G नेटवर्क पर चीन के कब्जे को अमेरिका रोक पायेगा?

5G तकनीक हाई स्पीड इंटरनेट सर्विस का वादा करती है और इसकी मदद से यूजर किसी फ़िल्म को महज कुछ सेकेंड में डाउनलोड कर लेते हैं। दुनिया के कई हिस्सों में इसकी शुरुआत हो चुकी है।

4G ने लोगों के अनुभवों को बहुत बदल दिया, ख़ासकर मोबाइल वीडियो और गेमिंग के अनुभव को। 5G और बदलाव लाएगा।

अमरीका और ब्रिटेन में 5G नेटवर्क की शुरुआत पर ख्वावे पर लगे प्रतिबंधों का भी असर पड़ा है।

सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अमेरिका ने चीनी कंपनी ख्वावे के उपकरणों का 5G नेटवर्क में इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है और अपने सहयोगियों को भी ऐसा करने की सलाह दी है।

अमरीकी कंपनियां ख्वावे को क्या बेच सकती हैं, इस पर भी नियंत्रण रखा जा रहा है। यही कारण है कि दुनियाभर में ख्वावे के फोन की बिक्री में गिरावट आई है।

वित्तीय सेवा समूह जेफरीज के विश्लेषक और इंडस्ट्री के जानकार एडिसन ली इसे दुनिया के 5G बाजार पर अमरीका के प्रभुत्व जमाने की कोशिश के रूप में देखते हैं।

वो मानते हैं कि ख्वावे पर अमरीका ने दबाव इसलिए बनाया है ताकि चीन को इस क्षेत्र में बादशाह बनने से रोका जा सके।

वो कहते हैं, "इस टेक वॉर के पीछे अमरीका का तर्क है कि चीन बौद्धिक संपदा की चोरी कर तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है और सरकार इस पर बेतहाशा ख़र्च कर रही है। उसका मानना है कि चीनी दूरसंचार उपकरण सुरक्षित नहीं हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा है।''

वो आगे जोड़ते हैं, "जैसे-जैसे दूरसंचार उपकरण के वैश्विक बाजार में ख्वावे और ZTE का दखल बढ़ता जाएगा, पश्चिम के देश जासूसी का मुद्दा जोर-शोर से उठाएंगे।''

ख्वावे ने हमेशा इन आरोपों को खारिज किया है कि उसकी तकनीक का इस्तेमाल जासूसी के लिए किया जा सकता है।

एक ओर जहां पश्चिम के देश ख्वावे को लेकर चिंतित हैं, वहीं दूसरी ओर चीन इस क्षेत्र में काफी आगे बढ़ गया है।

31 अक्तूबर को चीन की दूरसंचार कंपनियों ने 50 से ज़्यादा शहरों में 5G सेवा की शुरुआत की, जिसके बाद यहां दुनिया का सबसे बड़ा 5G नेटवर्क अस्तित्व में आया। इसका क़रीब 50 फ़ीसदी हिस्सा ख्वावे ने तैयार किया है।

चीन के सूचना मंत्रालय का दावा है कि महज 20 दिनों में इस सेवा से 8 लाख से ज़्यादा लोग जुड़े हैं। विश्लेषकों का अनुमान है कि चीन में 2020 तक 11 करोड़ 5G यूजर होंगे।

चीन अब इस नई तकनीक के नई तरह के इस्तेमाल पर काम कर रहा है।

उत्तरी हॉन्गकॉग के एक बड़े भूभाग पर शोधकर्ता वैसी गाड़ियां विकसित कर रहे हैं, जो 5G की मदद से खुद चलेंगी।

हॉन्गकॉन्ग एप्लाइड साइंस एंड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूशन के शोधकर्ता चीन की सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी चाइना मोबाइल के साथ मिल कर यह काम कर रहे हैं।

वे मानते हैं कि सेल्फ ड्राइविंग कार यानी खुद से चलने वाली कारों के लिए 5G उपयोगी साबित हो सकती है। इसके ज़रिए सड़कों पर गाड़ियां एक-दूसरे से बेहतर संपर्क स्थापित कर पाएंगी, साथ में इसका भी सटीक पता चल पाएगा कि आसपास क्या चल रहा है।

5G की शुरुआत करने वाला चीन दुनिया का पहला देश नहीं है। कई अन्य देश इसकी शुरुआत पहले कर चुके हैं, लेकिन इसने जिस तेज़ी से वैश्विक बाजार में अपना प्रभुत्व जमाया है, पश्चिम के देश इसे लेकर खासा चिंता में हैं।

ख्वावे और ZTE जैसी कंपनियां इसका भरपूर फायदा उठा रही हैं और विदेशी बाज़ारों में अमरीका को टक्कर दे रही हैं।

नवंबर में बीजिंग में हुए 5G सम्मेलन में चीन के उद्योग और सूचना मंत्री ने आरोप लगाया था कि अमरीका साइबर सिक्योरिटी का इस्तेमाल अपनी कंपनियों को संरक्षण देने के लिए कर रही है।

मियाओ वी ने कहा था, "किसी भी देश को इसके 5G नेटवर्क के विस्तार में किसी कंपनी को सिर्फ़ आरोपों के आधार पर रोका नहीं जाना चाहिए, जो कभी सिद्ध नहीं किए गए हों।''


क्या शिव सेना सेक्यूलर और मराठी हो गई है?

भारत में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उद्धव ठाकरे ने गुरुवार देर शाम कैबिनेट की पहली बैठक की।

इस बैठक के बाद सीएम उद्धव ठाकरे ने मीडिया को सम्बोधित किया। उद्धव ठाकरे ने कहा, ''मैंने अधिकारियों से कहा है कि किसानों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की जो योजनाएँ हैं, मुझे उसकी पूरी जानकारी दी जाए। अगले दो दिनों में महाराष्ट्र सरकार किसानों के लिए बड़े ऐलान करेगी। सरकार किसानों की खुशहाली के लिए काम करेगी।''

उद्धव ठाकरे सरकार ने रायगढ़ के शिवाजी किले के सरंक्षण के लिए 20 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी है। शिवाजी की रियासत की राजधानी रायगढ़ रहा था और फिलहाल इस किले की हालत बहुत अच्छी नहीं है।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक पत्रकार ने उद्धव ठाकरे से पूछा कि क्या शिवसेना सेक्यूलर हो गई है?

इस पर ठाकरे ने कहा, ''सेक्यूलर का मतलब क्या है? आप मुझसे पूछ रहे हैं सेक्यूलर का मतलब। आप बताओ न सेक्यूलर का मतलब क्या है? संविधान में जो कुछ है वो है।''

इस सवाल से उद्धव ठाकरे साफ़ असहज नज़र आए। संभवत: उद्धव ने इस सवाल की उम्मीद नहीं की होगी।

दूसरा ये कि उद्धव ने अब तक अपने घोर राजनीतिक विरोधी रहे कांग्रेस के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई है।

इसकी कल्पना कुछ वक़्त पहले तक राजनीति के जानकारों ने भी नहीं की होगी। शिवसेना 60 के दशक में अपने गठन के बाद से ही और ख़ासकर 80 के दशक से अपने कट्टर हिंदुत्व की छवि के लिए जानी जाती रही है।

वहीं कांग्रेस हमेशा ये दावा करती रही है कि वो एक सेक्यूलर पार्टी है। ऐसे में दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं की पार्टियों के एक साथ आने से ऐसे सवालों का उठना लाज़िमी है।

शिव सेना और कांग्रेस सत्ता में कभी साथ नहीं रहे लेकिन कई मुद्दों पर दोनों पार्टियां एक साथ रही हैं।

शिव सेना उन पार्टियों में से एक है जिसने 1975 में इंदिरा गांधी के आपातकाल का समर्थन किया था। तब बाल ठाकरे ने कहा था कि आपातकाल देशहित में है।

आपातकाल ख़त्म होने के बाद मुंबई नगर निगम का चुनाव हुआ तो दोनों पार्टियों को बहुमत नहीं मिला। इसके बाद बाल ठाकरे ने मुरली देवड़ा को मेयर बनने में समर्थन देने का फ़ैसला किया था।

1980 में कांग्रेस को फिर एक बार शिव सेना का समर्थन मिला। बाल ठाकरे और कांग्रेस नेता अब्दुल रहमान अंतुले के बीच अच्छे संबंध थे और ठाकरे ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में मदद की।

1980 के दशक में बीजेपी और शिव सेना दोनों साथ आए तो बाल ठाकरे ने खुलकर कांग्रेस का समर्थन कम ही किया लेकिन शिव सेना ने 2007 में एक बार फिर से राष्ट्रपति की कांग्रेस उम्मीदवार प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को समर्थन दिया, ना कि बीजेपी के उम्मीदवार को।

शिव सेना ने प्रतिभा पाटिल के मराठी होने के तर्क पर बीजेपी उम्मीदवार को समर्थन नहीं दिया था। पाँच साल बाद एक बार फिर से शिव सेना ने कांग्रेस के राष्ट्रपति उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को समर्थन दिया। बाल ठाकरे शरद पवार को पीएम बनाने पर भी समर्थन देने की घोषणा कर चुके थे।

इन उदाहरणों से साबित होता है कि शिव सेना को मराठी और हिदुत्व में से किसी एक को चुनना होगा तो वह मराठी को चुनेगा और हिंदुत्व को छोड़ देगा।

जो महाराष्ट्र में शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस के गठबंधन सरकार बनने से एक बार फिर से साबित हो गया है।

क्या भारत में बीजेपी और नरेंद्र मोदी का जादू खत्म हो रहा है?

भारत में मार्च 2018 तक बीजेपी की 21 राज्यों में सरकारें थीं। कुछ राज्यों में बीजेपी अपने दम पर सरकार में थी और कुछ राज्यों में सहयोगी दलों की मदद से सरकार चला रही थी।

2019 में जम्मू-कश्मीर के दो केंद्र शासित प्रदेशों में बँटने से पहले भारत में कुल 29 राज्य थे। केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 7 थी। अब राज्यों की संख्या घटकर 28 हो गई है। केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या बढ़कर 9 हो गई है।

महाराष्ट्र में एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस की सरकार बनने के बाद बीजेपी एक और राज्य में सत्ता से बाहर हो गई है।

2018 के विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हारने के बाद महाराष्ट्र बीजेपी के लिए ताज़ा झटका है।

किसी एक राजनीतिक पार्टी का भारत में इस संख्या में राज्यों की सरकारों में होना पहली बार नहीं है। 1993 में कांग्रेस पार्टी की भारत के 26 राज्यों में से 16 राज्यों में सरकारें थीं। इनमें से 15 राज्यों में कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में थी।

भारत में 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले भारतीय जनता पार्टी सात राज्यों में सत्ता संभाल रही थी।

मार्च 2018 आते-आते बीजेपी तेज़ी से बढ़ते हुए 21 राज्यों में सरकार बनाने में सफल रही। बीजेपी ने चार साल में तिगुना विस्तार किया।

2015 में जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने के लिए बीजेपी ने पीडीपी से हाथ मिलाया था। इन चुनावों में पीडीपी 28, बीजेपी 25, नेशनल कॉन्फ्रेंस 15 और कांग्रेस 12 सीटें जीत सकी थी। उस समय जम्मू-कश्मीर में कुल 87 विधानसभा सीटें थीं।

ये पहली बार था, जब पंजाब को छोड़कर पूरे उत्तर भारत में बीजेपी अकेले या अपने सहयोगी दलों के साथ सरकार में थी।

लेकिन बीजेपी का विस्तार 2018 से रुकना शुरू हुआ, जब कर्नाटक में कांग्रेस गठबंधन ने सरकार बना ली। हालांकि ये सरकार ज़्यादा दिन नहीं चली और कुछ वक़्त बाद बीजेपी ने फिर से राज्य में सरकार बना ली।

महाराष्ट्र के ताजा नतीजों के बाद ये साफ़ है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की राज्यों में पकड़ कम हो रही है।

हालांकि एक साल में बीजेपी जिन राज्यों में सत्ता से बाहर हुई है, उसकी संख्या बहुत ज़्यादा नहीं है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि बीजेपी भारत के बड़े राज्यों महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्ता से बाहर हो चुकी है जो बीजेपी के लिए बहुत बड़ा झटका है।

ये ऐसे राज्य हैं, जिनमें बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की पकड़ मज़बूत रही है। इन राज्यों की जनसंख्या भी दूसरे कई राज्यों के मुक़ाबले काफ़ी ज़्यादा है।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो 2018 में बीजेपी जिन राज्यों में सरकार में थी, वहां की कुल आबादी क़रीब 84 करोड़ थी। यानी भारत की कुल आबादी का 70 फ़ीसदी हिस्सा पर बीजेपी का शासन था।

हालिया चुनावों में हार के बाद बीजेपी की राज्य सरकारें भारत की कुल 47 फ़ीसदी आबादी पर राज कर रही हैं। यानी 2018 से क़रीब 23 फ़ीसदी की गिरावट आई है।

अब निगाहें दिसंबर में होने वाले झारखंड चुनावों पर हैं, जहां बीजेपी फिर से सत्ता में लौटने की कोशिश में है।

लेकिन क्या ऐसा हो पायेगा कहना मुश्किल है!

क्या भारत साइबर हमले से निपटने में सक्षम है?

बीते महीने तमिलाडु स्थित भारत के सबसे बड़े परमाणु संयंत्र कोडनकुलम में हुए साइबर अटैक ने भारत के साइबर सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए।

इस ख़बर के फैलने के बाद इस बात पर चर्चा होने लगी है कि क्या भारत किसी भी साइबर हमले से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है? क्या वह अपने महत्वपूर्ण आधारभूत ढांचों को हानि पहुँचाने वाले डिजिटल हमलों से बचा सकता है?

इस बहस ने एक और बड़े मुद्दे को हवा दे दी है, क्या भारत डेबिट कार्ड हैकर और दूसरे वित्तीय फ्रॉड से बचने के लिए तैयार है, क्योंकि ये भारत के करोड़ों लोगों का मुद्दा है।

पिछले ही महीने, भारतीय रिज़र्व बैंक ने बैंकों को एक चेतावनी दी है। यह चेतावनी सिंगापुर स्थित साइबर सिक्यूरिटी फ़र्म ग्रुप - आईबी की चेतावनी के बाद आया है जिसमें कहा गया था कि क़रीब 12 लाख डेबिट कॉर्ड के डिटेल्स ऑनलाइन उपलब्ध हैं।

बीते साल, हैकरों ने पुणे के कोस्मो बैंक के खातों से 90 करोड़ रुपये की फ़र्ज़ी ढंग से निकासी कर ली थी, ऐसा उन्होंने बैंक के डाटा सप्लायर पर साइबर हमले करके किया था।

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के साइबर इनिशिएटिव के प्रमुख अरुण सुकुमार ने बीबीसी को बताया, "भारत की फ़ाइनेंशियल सिस्टम पर हमला करना आसान है क्योंकि हम अभी भी ट्रांजैक्शन के लिए स्विफ्ट जैसे इंटरनेशनल बैंकिंग नेटवर्क पर निर्भर हैं। इंटरनेशनल गेटवेज़ की वजह से हमला करना आसान है।''

साइबर सिक्यूरिटी कंपनी सायमन टेक की एक रिपोर्ट बताती है कि ऐसे साइबर हमलों के लिए शीर्ष तीन ठिकानों में भारत एक है।

हालांकि भारत की विशाल डिजिटल आबादी को देखते हुए इसमें कमी आएगी। हर महीने फ्रांस जितनी आबादी भारत में कंप्यूटर से जुड़ रही है और यही बात सबसे बड़ी चिंता की है क्योंकि पहली बार इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों को भी डिजिटल पेमेंट करने के लिए कहा जा रहा है।

उदाहरण के लिए, नवंबर 2016 में भारत सरकार ने अचानक से 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट के चलन पर रोक लगा दी, यह देश में मौजूद कुल रक़म का 80 प्रतिशत हिस्सा थे। इसके विकल्प के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल पेमेंट को काफ़ी प्रमोट किया।

भारतीय पेमेंट प्लेटफॉर्म पेटीएम हों या फिर इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म गूगल पे हो, दोनों का कारोबार भारत में काफ़ी बढ़ गया है। क्रेडिट सुइसे की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2023 तक भारत में मोबाइल के ज़रिए एक ट्रिलियन डॉलर की पेमेंट होने लगेगी। क्रेडिट और डेबिट कार्ड का इस्तेमाल भी काफ़ी लोकप्रिय है। आज की तारीख़ में भारत में क़रीब 90 करोड़ कार्ड इस्तेमाल हो रहे हैं।

टेक्नालॉजी एक्सपर्ट प्रशांतो राय ने बीबीसी को बताया, "भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल काफ़ी नए लोग कर रहे हैं, इनकी आबादी 30 करोड़ से ज़्यादा है। ये मध्य वर्ग या निम्न वर्ग के लोग हैं। जिनकी डिजिटल साक्षरता बेहद कम है। इनमें विभिन्न राज्यों में काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूर हैं जो इसकी भाषा को नहीं समझते, उनके साथ धोखाधड़ी होने की आशंका बहुत ज्यादा है।''

इसके अलावा प्रशांतो राय दूसरी समस्या की ओर भी इशारा करते हैं, "दूसरी बात यह है कि बैंकों के फ्रॉड के बारे में काफ़ी कम रिपोर्टिंग होती है, कई बार उपभोक्ताओं को मालूम ही नहीं होता है कि आख़िर क्या हुआ था?"

भारत में वित्तीय धोखाधड़ी कई तरह से होती है। कुछ हैकर्स धोखाधड़ी के लिए एटीएम मशीनों में कार्ड की नक़ल उतारने वाले स्किमर्स लगा देते हैं या कीबोर्ड में कैमरा लगा देते हैं। इसके ज़रिए बिना किसी संदेह के आपके कार्ड का डुप्लीकेट तैयार हो जाता है। वहीं कुछ हैकर्स आपको फोन करके आपसे जानकारी निकालने की कोशिश करते हैं।

प्रशांतो राय बताते हैं, "भारत में डिजिटल ट्रांजैक्शन की प्रक्रिया धुंधली और कंफ्यूज करने वाली है। वास्तविक दुनिया में ये पता रहता है कि कौन पैसा ले रहा है और कौन दे रहा है लेकिन मोबाइल पेमेंट प्लेटफॉर्म में यह हमेशा स्पष्ट नहीं होता है। उदाहरण के लिए, कोई शख़्स ऑनलाइन एक टेबल बेच रहा है, कोई ख़रीददार बनकर ऑनलाइन पेमेंट करने की बात करता है।''

"इसके बाद वह बताता है कि उसने पेमेंट कर दिया है और आपको टेक्स्ट मैसेज के ज़रिए एक कोड मिलेगा। यह भुगतान सुनिश्चित करने के लिए होगा। ज्यादातर उपभोक्ता इसके बारे में नहीं सोचते और वे उस शख्स को इस कोड के बारे में बता देते हैं। अगली बात उन्हें यह पता चलती है कि उनके एकाउंट से ही पैसे निकल गए हैं।''

समस्या यह है कि सिस्टम ख़ुद में ना तो सुरक्षित है और ना ही पारदर्शी।  कोस्मो बैंक की धोखाधड़ी में यह बात सामने आई थी कि साफ्टवेयर इतने बड़े ट्रांजैक्शन के दौरान पैटर्न में आए मिस्मैच को नहीं पकड़ पाया। जब तक फ्रॉड पकड़ में आया तब तक बहुत बड़ी रक़म का नुक़सान हो चुका था।

किसी मानक के नहीं होने से भी, पहली बार उपयोग करने वालों के लिए ऑनलाइन ट्रांजैक्शन काफ़ी कंफ्यूजन पैदा करने वाला है। उदाहरण के लिए एटीएम मशीनों को देखिए, ये कई तरह के होते हैं और हर पेमेंट ऐप का इंटरफेस अलग-अलग है।

सुकुमार एक दूसरी बात भी सुझाते हैं, उनके मुताबिक़ यह लोगों की भी समस्या है, लोगों में सामान्य जागरुकता का अभाव है, जिसके चलते वे ख़ुद को और पूरी व्यवस्था को जोखिम में डाल लेते हैं।

सुकुमार बताते हैं, "कीबोर्ड का इस्तेमाल करने वाले लोगों को भी सावधानी बरतने की ज़रूरत है। कोडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट में जिस वायरस का हमला हुआ है, वह वहां एक कर्मचारी की वजह से ही पहुंचा था जिसने बाहर की एक यूएसबी को सिस्टम के कंप्यूटर में लगाया था।  इससे पूरे प्लांट के सिस्टम को ख़तरा हुआ। ऐसा ही किसी बैंक या फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन में संभव है।''

प्रशांतो राय के मुताबिक़ फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सरकार और वित्तीय संस्थानों की है ना कि उपभोक्ताओं की।

वे बताते हैं, "भारत में जिस रफ्तार से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ रहा है, उसे देखते हुए इसे केवल शिक्षा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। शातिर और दक्ष हैकरों पर नज़र रखना हर किसी के लिए संभव नहीं है क्योंकि वे लगातार अपनी रणनीति और तरीक़ों को बदलते रहते हैं। ऐसे में किसी फ्रॉड को रोकने की ज़िम्मेदारी रेगुलेटरों की है।''

इसके अलावा, विभिन्न साइबर सिक्यूरिटी संस्थानों के बीच आपसी संवाद की रफ्तार भी बहुत धीमी है। भारत के डिजिटल आधारभूत ढांचों की सुरक्षा करने वाले कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी) कई बार सरकार को ख़तरों के बारे में समय से जानकारी मुहैया नहीं करा पाती है।

लेकिन भारत सरकार को समस्या को अंदाज़ा है। यही वजह है कि देश 2020 के लिए राष्ट्रीय साइबर सिक्यूरिटी पॉलिसी तैयार कर रहा है। इसमें उन छह अहम क्षेत्रों की पहचान की गई है जिसमें स्पष्ट नीति की ज़रूरत महसूस की जा रही है। इनमें फाइनेंस सिक्यूरिटी भी शामिल है।

प्रशांतो राय के मुताबिक़ देश के अंदर हर अहम क्षेत्र का अपना कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी) होना चाहिए, जिसके बीच आपसी संवाद हो और सरकार संयोजक की भूमिका निभाए।

ऐसा होने की सूरत में ही भारत के कैशलेस इकॉनमी बनने की राह में आने वाले ख़तरों पर प्रभावी ढंग से अंकुश लग पाएगा।

नए भारत में रिश्वत और अवैध कमीशन को चुनावी बॉन्ड कहते हैं: राहुल गांधी

भारत में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर ताज़ा हमला किया है। उन्होंने एक ट्वीट कर लिखा, "नए भारत में रिश्वत और अवैध कमीशन को चुनावी बॉन्ड कहते हैं।''

राहुल गांधी ने अपने ट्वीट के साथ हफिंग्टन पोस्ट की उस ख़बर को शेयर किया जिसमें यह लिखा गया है कि आरबीआई ने इलेक्टोरल बॉन्ड को लेकर असहमति जताते हुए सवाल उठाए थे।

इससे पहले कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि आरबीआई को दरकिनार करते हुए इलेक्टोरल बॉन्ड पेश किए, ताकि काले धन को बीजेपी के कोष में लाया जा सके। कांग्रेस ने योजना को तुरंत समाप्त करने की मांग भी की।

वहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी कहा था कि, रिजर्व बैंक को दरकिनार करते हुए चुनावी बॉन्ड लाया गया ताकि कालाधन बीजेपी के पास पहुंच सके।

ट्वीट के जरिए प्रियंका ने लिखा, "आरबीआई को दरकिनार करते हुए और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को ख़ारिज करते हुए चुनावी बॉन्ड को मंजूरी दी गई ताकि बीजेपी के पास कालाधन पहुंच सके। ऐसा लगता है कि बीजेपी को कालाधान ख़त्म करने के नाम पर चुना गया था, लेकिन यह उसी से अपना जेब भरने में लग गई। यह देश की जनता के साथ निंदनीय धोखा है।''

ईरान ने क्यों कहा, 'भारत अपनी रीढ़ और मज़बूत करे'?

ईरान के विदेश मंत्री जावेद ज़ारिफ़ ने कहा है कि अगर संपूर्णता में चीज़ों को देखें तो इस्लामिक गणतांत्रिक सभ्यता ईरान और भारत के संबंध टूट नहीं सकते।

हालांकि जावेद ज़ारिफ़ ने कहा कि भारत को अपनी रीढ़ और मज़बूत करनी चाहिए ताकि हमारे ऊपर प्रतिबंधों को लेकर अमरीका के दबाव के सामने झुकने से इनकार कर सके।

ज़ारिफ़ ने भारत और ईरान के बीच सूफ़ी परंपरा के रिश्तों का भी ज़िक्र किया। ईरानी विदेश मंत्री तेहरान में पत्रकारों से बातचीत में ये बातें कह रहे थे। उन्होंने कहा कि अमरीकी प्रतिबंधों से पहले उन्हें उम्मीद थी कि भारत ईरान का सबसे बड़ा तेल ख़रीदार देश बनेगा। उन्होंने कहा कि अमरीकी दबाव के सामने भारत को और प्रतिरोध दिखाना चाहिए।

ज़ारिफ़ ने कहा, ''ईरान इस बात को समझता है कि भारत हम पर प्रतिबन्ध नहीं चाहता है लेकिन इसी तरह वो अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को भी नाराज़ नहीं करना चाहता है। लोग चाहते कुछ और हैं और करना कुछ और पड़ रहा है। यह एक वैश्विक रणनीतिक ग़लती है और इसे दुनिया भर के देश कर रहे हैं। आप ग़लत चीज़ों को जिस हद तक स्वीकार करेंगे और इसका अंत नहीं होगा और इसी ओर बढ़ने पर मजबूर होते रहेंगे।  भारत पहले से ही अमरीका के दबाव में ईरान से तेल नहीं ख़रीद रहा है।''

जावेद ज़ारिफ़ ने ये बातें भारतीय महिला पत्रकारों के एक दल से कही।

पिछले साल ट्रंप ईरान के साथ हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु समझौते से बाहर निकल गए थे। ट्रंप का कहना था कि ईरान परमाणु समझौते की आड़ में अपना परमाणु कार्यक्रम चला रहा है। इसी समझौते के तहत ईरान से 2015 में अमरीकी प्रतिबंध हटा था लेकिन ट्रंप ने फिर से इन प्रतिबंधों को लागू कर दिया था। अमरीकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह से ठहर गई है। भारत ने भी इन्हीं प्रतिबंधों के कारण ईरान से तेल ख़रीदना बंद कर दिया।

जावेद ज़ारिफ़ ने कहा, "अगर आप हमसे तेल नहीं ख़रीदेंगे तो ईरान आपका चावल नहीं ख़रीदेगा।''

ईरान ने भारत को ये सुविधा दे रखी दी थी कि तेल का भुगतान अपनी मुद्रा रुपया में करे। यह भारत के लिए फ़ायदेमंद था क्योंकि इससे रुपये की मज़बूती भी बनी रहती थी और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भी नहीं बढ़ता था। ज़ारिफ़ ने चाबहार पोर्ट के निर्माण में धीमी गति के लिए भी भारत से निराशा ज़ाहिर की।

ज़ारिफ़ ने कहा, "चाबहार भारत और ईरान के लिए काफ़ी अहम है।  चाबहार से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित होगी। अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता आएगी और इसका मतलब है कि आतंकवाद पर नकेल कसा जा सकता है।''

ज़ारिफ़ ने कहा कि अमरीकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की 80 मिलियन आबादी भुगत रही है। 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान लगातार अमरीकी प्रतिबंध झेल रहा है। इस क्रांति से ईरान में पश्चिम समर्थित शासक शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन का अंत हो गया था।

अयोध्या में साधु और संत आपस में क्यों लड़ रहे हैं?

भारत में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद में फ़ैसला देते हुए विवादित जगह रामलला को सौंप दी और मंदिर बनाने के लिए सरकार से तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट के गठन को कहा है, लेकिन अब साधु और संतों के विभिन्न संगठनों में इस ट्रस्ट में शामिल होने को लेकर विवाद शुरू हो गया है।

ये विवाद इस स्तर तक पहुंच गया है कि साधु अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ न सिर्फ़ अपशब्द बोल रहे हैं, बल्कि दो समूहों के बीच तो हिंसक संघर्ष तक की नौबत आ गई।

राम जन्मभूमि न्यास के महंत नृत्यगोपालदास पर कथित तौर पर अभद्र टिप्पणी के बाद उनके समर्थकों ने तपस्वी छावनी के संत परमहंसदास पर हमला बोल दिया और भारी संख्या में पुलिस बल पहुँचने के बाद ही परमहंसदास को वहाँ से सुरक्षित निकाला जा सका।

वहीं परमहंसदास को तपस्वी छावनी ने ये कहते हुए निष्कासित कर दिया गया है कि उनका आचरण अशोभनीय था और जब वो अपने आचरण में परिवर्तन लाएंगे तभी छावनी में उनकी दोबारा वापसी हो पाएगी।

लेकिन इस विवाद में सिर्फ़ यही दो पक्ष नहीं हैं बल्कि मंदिर निर्माण के मक़सद से पहले से चल रहे तीन अलग-अलग ट्रस्ट के अलावा अयोध्या में रहने वाले दूसरे रसूख़दार संत भी शामिल हैं।

दरअसल अयोध्या विवाद अदालत में होने के बावजूद रामलला विराजमान का भव्य मंदिर बनाने के लिए पिछले कई साल से तीन ट्रस्ट सक्रिय थे।

इनमें सबसे पुराना ट्रस्ट श्रीरामजन्मभूमि न्यास है जो साल 1985 में विश्व हिंदू परिषद की देख-रेख में बना था और यही ट्रस्ट कारसेवकपुरम में पिछले कई सालों से मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशने का काम कर रहा है।

दूसरा ट्रस्ट रामालय ट्रस्ट है जो बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद साल 1995 में बना था और इसके गठन के पीछे भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की भी भूमिका बताई जाती है।

जबकि तीसरा ट्रस्ट जानकीघाट बड़ा स्थान के महंत जन्मेजय शरण के नेतृत्व में बना श्रीरामजन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास है।

ये तीनों ही ट्रस्ट अब यह कह रहे हैं कि जब पहले से ही मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट मौजूद है तो सरकार को किसी अन्य ट्रस्ट के गठन की क्या ज़रूरत है? ये सभी ट्रस्ट अपने नेतृत्व में मंदिर निर्माण ट्रस्ट बनाने के लिए दबाव बना रहे हैं।

वीएचपी के नेतृत्व वाले श्रीरामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष और मणिरामदास छावनी के संत महंत नृत्यगोपाल दास हैं।

राम मंदिर आंदोलन के दौरान मंदिर निर्माण के लिए जो चंदा इकट्ठा किया गया, करोड़ों रुपये की वह धनराशि भी इसी ट्रस्ट के पास है।

चूंकि वीएचपी ने ही मंदिर निर्माण के लिए चलाए गए आंदोलन का नेतृत्व किया था इसलिए फ़ैसले के बाद वीएचपी के नेता और उससे जुड़े धर्माचार्य इसी ट्रस्ट के माध्यम से मंदिर बनाने का दावा कर रहे हैं और इसके लिए अभियान चला रहे हैं।

जबकि रामालय ट्रस्ट का गठन साल 1995 में द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती समेत 25 धर्माचार्यों की मौजूदगी में अयोध्या में रामजन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण के लिए किया गया था। इसके गठन में श्रृंगेरीपीठ के धर्माचार्य स्वामी भारती भी शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद रामालय ट्रस्ट के सचिव स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मंदिर बनाने का क़ानूनी अधिकार उन्हीं के पास होने का दावा ठोंक दिया। इसके लिए पिछले हफ़्ते दिल्ली में उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी की थी।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा, "अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद रामालय ट्रस्ट मंदिर निर्माण के ही निमित्त बना है। मंदिर निर्माण धर्माचार्यों के ही माध्यम से होना चाहिए। इसके लिए हमें किसी सरकारी मदद और हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं है। सरकार के इसमें किसी तरह का हस्तक्षेप करने पर हम कोर्ट भी जा सकते हैं।''

रामालय ट्रस्ट का दावा ठीक वैसा ही है जैसा कि श्रीरामजन्मभूमि न्यास का। दोनों का कहना है कि उन्हें मंदिर निर्माण की ज़िम्मेदारी सौंपी जाए और नया ट्रस्ट बनाने की ज़रूरत नहीं है।

रामालय ट्रस्ट का तर्क है कि उनका गठन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुआ है और उससे पहले बने ट्रस्ट अवैध हैं जबकि वीएचपी और श्रीरामजन्मभूमि न्यास का कहना है कि मंदिर निर्माण के लिए अदालती लड़ाई उन्होंने लड़ी है, इसलिए मंदिर बनाने का भी अधिकार उन्हीं को है।

जबकि इस विवाद में मुख्य पक्षकार रहे निर्मोही अखाड़े का कहना है कि नया ट्रस्ट जो भी बने, उसमें उसकी अहम भूमिका हो। निर्मोही अखाड़े की भूमिका की बात सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में भी की है।

वहीं श्रीरामजन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास के अध्यक्ष जन्मेजय शरण कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाने के लिए अधिकृत किया है, इसलिए यह अधिकार केंद्र सरकार को ही है कि वह कोई नया ट्रस्ट बनाए जो मंदिर निर्माण करे। यदि यह काम अकेले विश्व हिन्दू परिषद को दिया जाता है तो हम इसका विरोध करेंगे। सभी को निजी हितों को छोड़कर केवल मंदिर निर्माण पर ध्यान देना चाहिए। सरकार को चाहिए कि सभी न्यासों से प्रतिनिधियों को शामिल करके एक नया ट्रस्ट बनाए और इसकी निगरानी सरकार करे।''

इन सबके अतिरिक्त, रामलला विराजमान के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास कहते हैं कि ट्रस्ट का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार ही हो, न कि किसी पुराने ट्रस्ट को ये ज़िम्मा दिया जाए।

उनके मुताबिक, "सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ट्रस्ट बनाने का आदेश दिया है। इसी आदेश के तहत नया ट्रस्ट बने। पहले से जो ट्रस्ट राम मंदिर के निर्माण के नाम पर बने हैं, उन्हें भी अपनी संपत्तियां और इसके लिए इकट्ठा किए गए चंदे इसी सरकारी ट्रस्ट को सौंप देना चाहिए। सरकार को चाहिए कि जो लोग ऐसा न करें, उनसे ज़बरन लिया जाए।''

सत्येंद्र दास किसी का नाम तो नहीं लेते लेकिन निर्मोही अखाड़े के महंत दिनेंद्र दास सीधे तौर पर कहते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद को मंदिर निर्माण के नाम पर इकट्ठा किए गए ईंट, शिलाएं और यहां तक कि नकदी भी सरकार को सौंप देनी चाहिए।

लेकिन विश्व हिन्दू परिषद इसे इतनी आसानी से सौंप देगा, ऐसा लगता नहीं है।

वीएचपी प्रवक्ता शरद शर्मा कहते हैं कि केंद्र सरकार उनके काम की उपेक्षा नहीं कर सकती है।

शरद शर्मा कहते हैं, ''हम वर्षों से मंदिर निर्माण में लगे हुए हैं, हमारे संगठन ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया है। देश-विदेश के सभी हिन्दुओं का हमें समर्थन और सहयोग मिला है। मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूं कि प्रधानमंत्री मोदी हमसे सलाह लेंगे।''

मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट को लेकर चल रहे इस विवाद में दो महंतों के बीच हुई एक बातचीत के वायरल ऑडियो क्लिप ने आग में घी का काम कर दिया।

अयोध्या में संत समुदायों के बीच प्रसारित हो रहे एक ऑडियो क्लिप में राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय रहे वीएचपी नेता और बीजेपी के पूर्व सांसद रामविलास वेदांती कह रहे हैं कि वह मंदिर ट्रस्ट का प्रमुख बनना चाहते हैं।

हालांकि हम इस ऑडियो क्लिप की पुष्टि नहीं करते हैं लेकिन इस क्लिप ने अयोध्या के संतों में काफ़ी हलचल पैदा कर दी है।

यह ऑडियो क्लिप कथित रूप से रामविलास वेदांती और तपस्वी छावनी के प्रमुख महंत परमहंसदास के बीच बातचीत का है।

इसी ऑडियो क्लिप में महंत परमहंसदास कथित रूप से राम जन्मभूमि न्यास के प्रमुख महंत नृत्यगोपाल दास के लिए अशोभनीय शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और इसी से नाराज़ होकर नृत्यगोपालदास के समर्थक साधुओं ने उनके घर पर हमला बोल दिया था।

नृत्यगोपाल दास ने ट्रस्ट में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी शामिल करने की मांग कर चुके हैं और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि भी उनकी मांग का समर्थन कर चुके हैं जबकि इस ऑडियो क्लिप में रामविलास वेदांती और परमहंसदास ने योगी आदित्यनाथ को इसमें शामिल करने का विरोध किया है क्योंकि वो रामानंद संप्रदाय से नहीं आकर नाथ संप्रदाय से आते हैं।

हालांकि रामविलास वेदांती इस बातचीत से साफ़ इनकार करते हैं जबकि परमहंसदास इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे हैं लेकिन महंत नृत्यगोपालदास के ऊपर परमहंसदास कई गंभीर आरोप लगा रहे हैं।

अयोध्या में वर्षों से मंदिर आंदोलन को क़रीब से देखने वाले स्थानीय पत्रकार महेंद्र त्रिपाठी कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच के विवाद को भले ही ख़त्म करने की कोशिश की है लेकिन अब अयोध्या में साधु और संतों के बीच विवाद और टकराव बढ़ेंगे। इस बात की आशंका पहले से ही थी कि ट्रस्ट का हिस्सा बनने के लिए हिंदूवादी संगठनों के बीच आपसी टकराव होगा लेकिन अब जिस तरीक़े से स्टिंग ऑपरेशन और एक-दूसरे पर ज़ुबानी हमले हो रहे हैं उससे इस विवाद के बढ़ने की ही आशंका है। अभी तो और भी कई संत हैं जो इस फ़ैसले का लंबे समय से इंतज़ार कर रहे थे, अब वो भी मांग करेंगे कि उन्हें भी ट्रस्ट में शामिल किया जाए।''